प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ के समक्ष है पार्टी संगठन को मजबूत करने की चुनौती

 

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ के समक्ष है पार्टी संगठन को मजबूत करने की चुनौती। फाइल

MP Politics वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा की थी। इसके बाद संगत में पंगत कार्यक्रम चलाकर पार्टी की अनदेखी से रूठकर घर बैठ चुके नेताओं को मनाकर सक्रिय किया था।

वैसे तो मध्य प्रदेश विधानसभा का चुनाव वर्ष 2023 के अंत में होना है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। पिछले चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद भी सत्ता सुख भोग रही भाजपा के लिए यह चुनाव अहम तो होगा ही, कांग्रेस के लिए खासतौर पर यह बड़ी चुनौती होगी जिसे 2018 के चुनाव में मतदाताओं ने सबसे बड़ी पार्टी बनाकर सत्ता तक पहुंचाया था। अपनों के झगड़े के कारण सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस मतदाताओं की संवेदना के आधार पर सरकार में वापसी के सपने देख रही है। वह कितना सफल होगी यह तो समय तय करेगा, लेकिन फिलहाल नेताओं की गुटबंदी और अंतर्विरोध ने उसकी सांगठनिक तैयारियों के समक्ष बड़ी चुनौती पेश की है।

लगभग 15 साल के लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक 114 सीटें हासिल की थी। बहुमत से कुछ सीटें कम होने के बावजूद वह सत्ता में पहुंचने में कामयाब हो गई थी। हालांकि गठन के बाद से ही कांग्रेस की सरकार अंतर्विरोधों से जूझती रही। कमल नाथ को मुख्यमंत्री बनाया जाना ज्योतिरादित्य सिंधिया को अंत तक अखरता रहा। यही कारण है कि समय-समय पर वह सरकार के कामकाज को लेकर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते रहे। इस तरह 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस आपसी खींचतान के कारण करीब 15 माह में ही धराशायी हो गई। कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान का फायदा उठाकर भाजपा ने फिर सरकार बना ली और कांग्रेस हाथ मलती रह गई। उम्मीद थी कि सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस अपनी गलतियों से सबक लेगी और दमदार विपक्ष की भूमिका निभाकर प्रदेशवासियों के दिल में फिर स्थान बनाएगी, लेकिन अब भी कांग्रेस अंदरूनी संकट से ही अधिक जूझ रही है। कांग्रेस के क्षत्रप अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण आपस में ही उलङो हुए हैं। नेताओं के बीच की गुटबंदी उसकी सांगठनिक तैयारियों पर असर डाल रही है। यही वजह है कि कोई भी कार्यक्रम ठीक ढंग से अंजाम तक नहीं पहुंच पा रहा है।

हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद मिली चुनौतियों का सामना करते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ यह बात अच्छी तरह जान चुके हैं कि बूथ स्तर पर भाजपा का मुकाबला सिर्फ अपने नेताओं की बदौलत नहीं हो सकता है। इसके लिए संगठन को तैयार करना होगा। पार्टी के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ताओं को बूथ की जिम्मेदारी सौंपनी होगी, जो किसी भी स्थिति में प्रभावित न हों। इसके लिए उन्होंने बूथ, मंडलम और सेक्टर इकाई को तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया है। वह कहते भी हैं कि हमारा मुकाबला भाजपा के नेताओं से नहीं, बल्कि उसके संगठन से है। दरअसल वह जानते हैं कि भाजपा के पास समर्पित कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है, जिसकी निष्ठा किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होती है।

यही वजह है कि उन्होंने जिला अध्यक्ष, जिला प्रभारी और वरिष्ठ नेताओं से दो-टूक कह दिया है कि जो भी इन इकाइयों के गठन में अपेक्षित सहयोग नहीं करेगा, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 40.89 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। जबकि भाजपा को 41.02 प्रतिशत मत मिले थे। वह जानते हैं कि कांग्रेस ने भाजपा की तुलना में कम मत पा कर भी भले ही अधिक सीटें जीत कर सत्ता की दहलीज पर कदम रख लिया था, लेकिन आगे का रास्ता बहुत ही कठिन है। इसीलिए उनका जोर इस बार वोट प्रतिशत बढ़ाने के प्रयासों पर है। पार्टी ने 31 मार्च तक 50 लाख सदस्य बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

हालांकि नेताओं की खींचतान के बीच कांग्रेस के सामने क्षेत्रीय संतुलन बनाने की चुनौती भी छोटी नहीं है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता थे। सिंधिया का ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में खासा प्रभाव है। इसका फायदा कांग्रेस को 2018 के चुनाव में मिला था। इस क्षेत्र के सिंधिया समर्थक विधायकों ने जब बगावत की तो कमल नाथ को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

सिंधिया के जाने के बाद उनका विकल्प अब तक पार्टी तैयार नहीं कर पाई है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव निमाड़ क्षेत्र का बड़ा चेहरा हैं, पर वे हाशिये पर हैं। उनका कमल नाथ के साथ तालमेल ठीक नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने पूरी तैयारी करने के बाद भी खंडवा लोकसभा का उपचुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया था। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को विंध्य क्षेत्र से अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह तक चुनाव हार गए थे। उम्मीद की जा रही थी कि पार्टी अजय सिंह को बड़ी जिम्मेदारी देगी, पर अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। एक बार फिर दिग्विजय सिंह प्रदेश में सक्रिय हैं, लेकिन संगठन के साथ कई मौकों पर उनकी भी खटपट उजागर हो चुकी है।