अगर आप भी करते हैं ब्यूटी प्राडक्ट का इस्तेमाल तो पढ़ लें ये जरूरी खबर, रिपोर्ट में सामने आई चौंकाने वाली जानकारी

 

माइक्रोबीड्स पर्यावरण, विशेष रूप से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

साथ ही पर्यावरण और जलीय जीवों के लिए भी हानिकारक हैं। यह तथ्य सामने आया है गैर सरकारी संगठन टाक्सिक लिंक द्वारा बृहस्पतिवार को जारी किए गए अध्ययन डर्टी क्लींसर असेसमेंट आफ माइक्रोप्लास्टिक्स इन कास्मेटिक्स से।

नई दिल्लीsurender Aggarwal । अगली बार जब आप अपने चेहरे को फेसवाश से साफ करें, स्क्रब का इस्तेमाल करें अथवा बाडीवाश खरीदें तो इसका भी ध्यान रखें कि ये उत्पाद आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साथ ही पर्यावरण और जलीय जीवों के लिए भी हानिकारक हैं। यह तथ्य सामने आया है गैर सरकारी संगठन टाक्सिक लिंक द्वारा बृहस्पतिवार को जारी किए गए अध्ययन 'डर्टी क्लींसर : असेसमेंट आफ माइक्रोप्लास्टिक्स इन कास्मेटिक्स' से।

अध्ययन बताता है कि भारत में आश्चर्यजनक रूप से बड़ी संख्या में पर्सनल केयर कास्मेटिक उत्पाद (पीसीसीपी) के कुछ प्रमुख ब्रांडों में हानिकारक माइक्रोप्लास्टिक शामिल हैं। 35 पीसीसीपी के आकलन पर 52 पृष्ठों का यह अध्ययन बताता है कि दैनिक उपयोग की वस्तुओं से निकलने वाले माइक्रोबीड्स पर्यावरण, विशेष रूप से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

क्या हैं माइक्रोबीड्स

माइक्रोबीड्स पांच मिमी से कम व्यास वाले ठोस प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक होते हैं। इनका उपयोग सौंदर्य प्रसाधन उत्पादों में त्वचा को साफ करने, सुंदर दिखाने और चिपचिपाहट नियंत्रण के लिए होता है। उपयोग के बाद उन्हें कचरे के रूप में नाली में बहा दिया जाता है। गैर-बायोडिग्रेडेबिलिटी के कारण यह पर्यावरण में कई साल तक बने रहते हैं। सौंदर्य प्रसाधनों में उपयोग किए जाने वाले माइक्रोबीड्स जलीय वातावरण में मानव निर्मित ठोस कचरे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और समुद्री जीवन को प्रभावित करते हैं।

इस अध्ययन में परीक्षण किए गए उत्पादों में पाए गए माइक्रोबीड्स का आकार 32.55-130.92 मीटर की सीमा में था। टाक्सिक लिंक के प्रोग्राम कोआर्डिनेटर डा. अमित ने कहा, 'ये छोटे आकार के माइक्रोबीड्स सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम से आसानी से गुजर सकते हैं और समुद्र में तैर सकते हैं। 'अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष- 35 नमूनों में से 20 में पालिमर की उपस्थिति पाई गई, जिनमें से 14 में माइक्रोबीड्स पाए गए।

- परीक्षण किए गए सभी उत्पादों (फेसवाश, स्क्रब और बाडीवाश) में, न्यूट्रोजेना स्क्रब में सबसे अधिक माइक्रोप्लास्टिक बीड्स पाए गए। इसके बाद वीएलसीसी फेस स्क्रब व फियामा शावर जेल का नाम है।

- प्रति 20 ग्राम नमूनों में निकाले गए मोतियों का अधिकतम वजन नायका बाडी स्क्रब में 0.85 ग्राम था, इसके बाद न्यूट्रोजेना स्क्रब में 0.69 ग्राम और क्लीन एंड क्लियर स्क्रब में 0.54 ग्राम था।

- अध्ययन में शामिल 19 फेसवाश नमूनों में से 10 में प्लास्टिक पालिमर पाए गए, सबसे अधिक संख्या में प्रति 20 ग्राम 4,258 मोती लैक्मे फेसवाश में पाए गए।

- बाडीवाश में सबसे ज्यादा 4,727 माइक्रोबीड्स प्रति 20 ग्राम फियामा शावर जेल में पाए गए।

- नमूनों में मोतियों के छह अलग-अलग रंगों (नीला, लाल, सफेद, हरा, नारंगी और पारदर्शी) की पहचान की गई।

- 14 विभिन्न प्रकार के पालिमर, अर्थात एक्रिलोनिट्राइल फिल्म, पालीएथिलीन, पाली एक्रेलिक, एक्रिलोनिट्राइल/ब्यूटाडीन/स्टाइरीन, पालीविनाइल अल्कोहल, पालीमाइड, पाली ब्यूटाइल मेथैक्रिलेट, पीएएम, लैनोलिन, एथिलीन/ कोपोलिमर, पालीप्रोपाइलीन, एलडीपीई, एथिलीन/विनाइल एसीटेट कोप्लायमर और परीक्षण किए गए नमूनों में ईवीओएच पाए गए।

मुख्य समन्वयक, टाक्सिक लिंक

इतने बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के उत्पादों में प्लास्टिक माइक्रोबीड्स मिलना चौंकाने वाला है। इनमें से कई ब्रांडों ने अन्य देशों में अपने उत्पादों में माइक्रोबीड्स डालना बंद कर दिया है, लेकिन भारत में इसका उपयोग जारी है, क्योंकि हमारे पास इस पर एकमुश्त प्रतिबंध नहीं है।