प्रकृति के उपासक है हम: हमारा शरीर पंचतत्व से बना

 

कई शोधों में यह बात सामने आई है कि आर्कटिक की मिट्टी में क्लोरोफिल की मात्रा बढ़ी

पर्यावरण के संतुलन में पेड़ पौधों की महत्ता सर्वोपरि है। इस बात को मनीषियों ने माना है। मौजूदा समय में जीवाश्म ईंधन की आवश्कता काफी बढ़ चुकी है। प्लेन टेलीविजन और बाद में हर मर्ज की दवा के तौर पर जाने जाना वाला इंटरनेट ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से मिलती है।

 भारतीय संस्कृति में प्रकृति की पूजा ईश्वर की पूजा के समान है। श्री कृष्ण द्वारा शुरू कराई गई गोवर्धन पर्वत की पूजा उनके प्रकृति प्रेम को दर्शाता है। छठ पर्व भी लोगों के प्रकृति प्रेम को दर्शाता है। इस पर्व की खासियत यही है कि लोग प्रकृति के काफी करीब तो पहुंचता ही है, उसमें देवत्व स्थापित करते हुए उसे सुरक्षित रखने की कोशिश भी करता है। छठ पर नदियों, जलाशयों, गांव के पोखर और कुएं साफ कर दिए जाते हैं।रामचरित मानस में कहा गया है कि 'क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच रचित अति अधम शरीरा' हमारा शरीर जीवन पंचतत्व से बना है। यह जीवन तभी बचेगा जब हम पर्यावरण के प्रति सचेत रहेंगे। हमारी प्रकृति और पर्यावरण में भी ये पांच तत्व मुख्य रूप से घुले हुए हैं। यदि इन तत्वों में प्रदूषण होता है, तो इससे न केवल हमारा पर्यावरण दूषित होता है, बल्कि हमारे शरीर और मन भी अस्वस्थ व रोगी बनते हैं। प्रकृति में घुले हुए ये पंचतत्व आपस में घुले-मिले हैं, एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी भी तत्व में आया हुआ असंतुलन दूसरे तत्व को प्रभावित करता है। किसी भी तत्व में कमी या वृद्धि दूसरे तत्व को प्रभावित करती है।

बहइ सुहावन त्रिविध समीरा ।

भइ सरजू अति निर्मल नीरा

रामचरित मानस में गंगा यमुना तथा संगम के चित्रण के अतिरिक्त सरयू नदी का विवरण भी है । सरयू का निर्मल जल आसपास के वायु मण्डल को भी शुद्ध किए हुए है। यह बताता है कि अगर हम अपने आस-पास की नदियों, तालाबों को साफ रखेंगे तो समृद्धि दूर नहीं जाएगी।

दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है

पर्यावरण के संतुलन में पेड़ पौधों की महत्ता सर्वोपरि है। इस बात को मनीषियों ने माना है। मत्स्य पुराण में लिखा है कि दश कूप समा वापी, दशवापी समोहद्रः। दशहृद समः पुत्रो, दशपुत्रो समो द्रुमः। यानी दस कुंओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब होता है, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है।

यजुर्वेद कहता है...

‘सन्तेवायुर्मातरिश्वा दधातूत्तानाया हृदयं यद्विकस्तम्। यो देवानां चरसि प्राणथेन कस्मैदेव वषडस्तु तुभ्यम। पृथ्वी अपने विशाल हृदय को मातृवत प्राणशक्ति संचारक वायु, जल एवं वनस्पतियों से पूर्ण करें। पृथ्वी पर उन्हें दूषित न करें।

बीते साल एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस एके गोयल पीठ ने कहा था कि भारत में कम से कम इस बात के पर्याप्त दस्तावेज हैं जो दिखाते हैं कि इस देश के लोगों ने प्रकृति और पर्यावरण को उचित सम्मान दिया है और समग्रता व श्रद्धा का व्यवहार किया है। उन्होंने चंडोज्ञ उपनिषद का हवाला देते हुए कहा था कि कि पानी ने पौधों को उत्पन्न किया है जो भोजन पैदा करते हैं। ऋग्वेद कहता है कि वनों को नष्ट नहीं करना चाहिए, पृथ्वी सृजन की बेल और वनों की पिटारी है और पेड़ पौधे और औषधि जीवित हैं।

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महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था, 'अतीतानागते चोभे पितृवंश च भारत। तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत्'। यानी हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों और भविष्य में जन्म लेने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है। इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौधे लगाए।

मौजूदा समय में जीवाश्म ईंधन की आवश्कता काफी बढ़ चुकी है। प्लेन, टेलीविजन और बाद में हर मर्ज की दवा के तौर पर जाने जाना वाला इंटरनेट, सभी को ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से मिलती है। इस बात में कोई शक नहीं है कि आने वाले समय में औद्योगिकरण को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। औद्योगिकरण की इस आपाधापी में न जाने कितने लोग काल-कवलित हो गए। शहरों का वातावरण पूरी तरह से बदल गया। बढ़ते धुएं और प्रदूषण की वजह से लोग कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। बिजली के अविष्कार ने तो जैसे इंडस्ट्री का रूख ही बदल दिया। लोगों की दिनचर्या पूरी तरह से बदल गई है।

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पिछले दशक में आर्कटिक में बायोलॉजिक बूम देखने में आ रहा है। कई शोधों में यह बात सामने आई है कि आर्कटिक की मिट्टी में क्लोरोफिल की मात्रा बढ़ी है। जैसा कि आप जानते हैं कि आर्कटिक में उगने वाले पौधे वर्ष भर बर्फ से ढके रहते है। वर्तमान में बसंत में ही बर्फ के गलने की वजह से यहां के पौधों में तेजी से बढ़ोतरी होने लगी। जो कि पर्यावरण के लिहाज से बेहतर संकेत नहीं है। पिछले एक दशक में आर्कटिक की तकरीबन 200 झीलें गुम हो गई है। जिससे शोधकर्ताओं की इस बात को बल मिला है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे ज्यादा प्रभाव पृथ्वी के ध्रुवों पर पड़ेगा। जब इसकी जांच की गई कि पानी कहां गायब हो रहा है, तो संभावना यह निकली कि झील के नीचे का मजबूत धरातल नष्ट हो रहा है। जब स्थाई रूप से जमा हुआ मजबूत धरातल गलने लगेगा, तो झीलों का पानी बहकर धरती पर आने लगेगा। यह बिलकुल वैसी ही स्थिति होगी जैसे कि बाथटब से प्लग निकाल दिया गया हो। वहीं जब झीलें नहीं रहेगी, तो इकोसिस्टम पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

सतह के अंदर का मजूबत धरातल भी गल रहा है। इसके गलने की वजह से जमीन सिकुड़ेगी, जिससे बड़े गड्ढे होंगे, भूस्खलन की संभावना बढ़ेगी। साथ ही रेलवे ट्रेक, हाइवे और घरों को भी काफी नुकसान होगा। ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव की वजह से मानव के जेनटिक गुणों में आमूल-चूल परिवर्तन आएगा। ऐसे में उसका ही जीवित रहना संभव हो पाएगा, जो इन परिस्थितयों से तारतम्य बिठा सकने में सक्षम होगा। जिस तरह से ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या बढ़ रही है, उससे पशु-पक्षियों में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जीन का स्थांतरण होगा और कई प्रजातियों में बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगे।

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ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते प्रभाव की वजह से समुद्र के ज्वार में परिवर्तन आया है। जिसके परिणामस्वरूप बाढ, तूफान जैसी आपदाओं का सामना पूरा विश्व कर रहा है। इसकी वजह से 600 वर्ष पुरानी सुखोथाई सभ्यता खत्म हो चुकी है। एक जमाने में यह थाईलैंड की राजधानी हुआ करती थी। ग्लैशियर के गलने की वजह से ज्यादा चक्रवात आएंगे। अमेरिका में जंगलों में इसके दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं, जहां पिछले दिनों जंगलों में आग के मामलों में बढ़ोतरी आई है। वैज्ञानिकों ने मुताबिक जंगल में तेज लपटों के उठने का कारण तापमान का गर्म होना और बर्फ का गलना है। साथ ही वसंत जल्दी आने की वजह से जंगल सूख जाएंगे और इसकी वजह से वहां आग की संभावना बढ़ेगी।

समस्याएं है तो हल भी होंगे। हम सबको अपने हिस्से की हिस्सेदारी करनी होगी। इसी के मद्देनजर दैनिक जागरण और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने अर्थ ऑवर को एक उत्सव और संकल्प का दिन मानकर एक अभियान कल की रौशनी आज बचाएं की शुरुआत की है। दैनिक जागरण समूह इस अभियान को अर्थ ऑवर से शुरु कर अर्थ डे तक चलाएगा। पर्यावरण के इस अभियान में आपकी सहभागिता इसकी सफलता का पैमाना बनेगी। आईए अपनी धरती को बचाने के लिए साथ जुड़ें।