स्थानीयता नीति: आगे कुआं, पीछे खाई...झारखंड में मचा सियासी घमासान

 

संशय में झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन। फाइल

JMM के कुछ नेता पार्टी के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए अलग राह पकड़ चुके। विधायक लोबिन हेंब्रम घोषणा कर चुके हैं कि वह पांच अप्रैल से सत्तू-चना लेकर घर से निकल जाएंगे और तभी वापस लौटेंगे जब 1932 के खतियान के अनुसार स्थानीय नीति लागू हो जाएगी।

रांची। झारखंड का स्थायी निवासी कौन है? राज्य गठन के 22 साल बाद भी इस पर रार जारी है। राज्य बनने के बाद से ही आदिवासी, मूलवासी 1932 के खतियान (जमीन का सर्वे) के आधार पर स्थानीय निवासी की पहचान करने की मांग करते आ रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) इसका सबसे बड़ा पैरोकार रहा है, लेकिन बुधवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा में यह कहकर सभी को चौंका दिया कि अगर वर्ष 1932 के सर्वे को आधार मानकर स्थानीय नीति बनती है तो वह न्यायालय से रद हो जाएगी।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब इस बात का अंदाजा सरकार और उनकी पार्टी को पहले से था तो लंबे समय से ऐसा वादा क्यों किया जा रहा था? क्या झामुमो के रुख में यह बदलाव कांग्रेस के दबाव में आया है? जो भी हो, राज्य की राजनीति के लिए यह बड़ा जटिल और संवेदनशील मुद्दा रहा है और मौजूदा परिस्थितियों में झामुमो की स्थिति आगे कुआं, पीछे खाई जैसी हो गई है।

दरअसल झामुमो यानी झारखंड मुक्ति मोचरे आरंभ से ही झारखंड में वर्ष 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाने के लिए संघर्षरत रहा है। उसके चुनावी वादों में यह हमेशा सबसे प्रमुख मुद्दा रहा है। पिछले दिनों पार्टी के अधिवेशन में भी इस पर प्रस्ताव पास हुआ। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन से लेकर तमाम कद्दावर नेता इसकी वकालत करते रहे हैं। हाल के दिनों में भी शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो, विधायक लोबिन हेंब्रम आदि झामुमो के नेता मजबूती से यह मुद्दा उठाते और दोहराते रहे हैं। अब अचानक पार्टी के इस मुद्दे से पीछे हटने की क्या वजहें हो सकती हैं, इसे लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में झामुमो को इससे बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

दरअसल पिछले कुछ महीनों से स्थानीय नीति, नियोजन नीति में भाषाओं को हटाने-जोड़ने को लेकर गठबंधन सरकार के निर्णयों से सहयोगी पार्टी कांग्रेस के विधायक खुद को काफी असहज महसूस कर रहे हैं। मुख्यमंत्री उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं। कांग्रेसी अपनी इस पीड़ा से राष्ट्रीय नेतृत्व को कई बार अवगत करवा चुके हैं। यहां तक सरकार में शामिल कांग्रेस कोटे के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने तो खुलेआम ऐलान कर रखा है कि अगर मातृभाषा पर कोई आंच आएगी तो वह अपनी कुर्सी कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। पांच राज्यों में हुए चुनाव के बाद कांग्रेसी विधायकों में बेचैनी बढ़ी है। उन्हें लग रहा है कि अगर झामुमो 1932 के खतियान के आधार पर आगे बढ़ता है तो उनके शहरी वोट का बड़ा नुकसान होगा।

जब-जब इस मुद्दे को किसी ने छुआ है वह झुलसा ही है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इसी आधार पर स्थानीय को पहचान करने की नीति लागू की थी। तब राज्य में भारी बवाल हुआ था। भारतीय जनता पार्टी की रघुवर दास सरकार ने वर्ष 1985 का कटआफ डेट मानकर स्थानीय व नियोजन नीति बनाई थी। उस समय इसका भी काफी विरोध हुआ था और आदिवासियों- मूलवासियों में यह फैलाया गया कि राज्य की नौकरियों पर बाहरी काबिज हो जाएंगे। हेमंत सोरेन की सरकार ने पिछले कुछ महीने में नई नियुक्ति नियमावली बनाई है, जिनमें स्थानीय लोगों को नौकरियों में आरक्षण के प्रविधान किए गए हैं। इसके खिलाफ भी कुछ लोग उच्च न्यायालय चले गए हैं। न्यायालय ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि स्थानीय नीति को जल्द से जल्द परिभाषित किया जाए नहीं तो राज्य में निकाली जा रही सभी भर्तियां कानूनी पचड़े में फंस जाएंगी।

दरअसल यह बहुत पेचीदा विषय है। झारखंड के कुछ जिलों में अंतिम बार सर्वे सेटलमेंट 1932-33 में शुरू होकर 1935 में पूरा हुआ। राज्य के कुछ जिलों में यह 1938 में पूरा हुआ। आजादी के बाद 1956 में बिहार में कई जिलों का पुनर्गठन हुआ, जिसमें झारखंड (तब बिहार का हिस्सा) के कुछ हिस्से भी प्रभावित हुए। संयुक्त बिहार में 1981 में सर्वे का कार्य शुरू हुआ और कुछ जिलों में यह 1995 में पूरा हुआ।

इतना ही नहीं, कई जिलों में सर्वे अब तक अधूरा है। जिन जिलों में अभी तक सर्वे का काम पूरा ही नहीं हुआ है, वहां स्थानीय की पहचान का पैमाना क्या होगा? यह सवाल इतना उलझाऊ और दुश्वारीभरा है, कि कोई यह दावे से नहीं कह सकता है कि राज्य सरकार जो भी नीति बनाएगी उससे सभी सहमत होंगे। वहीं दूसरी ओर, आजसू वर्ष 1932 के खतियान को ही आधार बनाने के लिए आंदोलनरत है।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के कुछ नेता पार्टी के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए अलग राह पकड़ चुके हैं। विधायक लोबिन हेंब्रम घोषणा कर चुके हैं कि वह पांच अप्रैल से सत्तू-चना लेकर घर से निकल जाएंगे और तभी वापस लौटेंगे जब 1932 के खतियान के अनुसार स्थानीय नीति लागू हो जाएगी। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस न तो इसका खुलकर समर्थन करते हैं न ही विरोध। उन्हें डर है कि अगर समर्थन करते हैं तो राज्य में बड़ी संख्या में रह रहे बिहार और उत्तर प्रदेश के लाग नाराज होंगे। वहीं, अगर विरोध करते हैं तो आदिवासी, मूलवासी नाराज होंगे।