बेहद गौरवशाली है भारतीय नारी के शौर्य और साहस की कहानी

 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय नारी की साहसी भूमिका को समझेें।

Womens Day 2022 अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में उन बहुत सी महिला स्वाधीनता सेनानियों को याद करने का एक सुअवसर देता है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया लेकिन उनके बारे में लोगों को पता ही नहीं चला...

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस दुनियाभर में महिलाओं को सम्मान, समानता, अधिकार और उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सरोकार पर बल देने के लिए मनाया जाता है। भारत में आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में इस दिवस का अपना एक अलग महत्व है। इसलिए कि इसी बहाने हम आजादी के संघर्ष में भारतीय नारी की अप्रतिम साहसी भूमिका को समझ पाते हैं। अगर हम और भी पहले चलें तो हमारी प्राचीन परंपरा नारी के सम्मान पर हमेशा से बल देती रही है। वैदिक काल में स्त्री सम्मान की स्थिति यह थी कि बिना उनकी उपस्थिति के कोई कार्य पूरा नहीं होता था।थर्ववेद का एक श्लोक है- यत्र नार्यस्तु पूच्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, यत्रैतास्तु न पूच्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, उसे सम्मान दिया जाता है वहां देवता विचरण करते हैं, और जहां उसके प्रति अनादर का भाव होता है, वहां किसी भी तरह के या सभी तरह के कर्म निष्फल होते हैं। नारी सम्मान की यह शृंखला देवी सीता या मां पार्वती की कथाओं से गंगा, सावित्री, कुंती, द्रौपदी, गार्गी, मैत्रेयी, शकुंतला आदि के रूप में हर समय, हर काल में विद्यमान रही, पर अफसोस की बात यह है कि स्त्री के इस सम्मान को धीरे-धीरे भुलाने की कोशिश की गई।

अगर हम देश में लंबे समय तक चले स्वाधीनता संग्राम को भी देखें तो इस आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका बहुत बड़ी थी, लेकिन अफसोस है कि स्वाधीनता के सात दशक बाद भी इनमें से बहुत सी महिलाओं के बलिदान और साहस को रेखांकित नहीं किया जा सका है। हम बलिदानी नारियों की सूची बनाते हैं तो रानी लक्ष्मीबाई, रानी अहिल्याबाई होल्कर, दुर्गाबाई देशमुख, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, सरोजिनी नायडू, कादंबिनी गांगुली, एनी बेसेंट, भीखाजी कामा, सुचेता कृपलानी, रानी कित्तूर चेनम्मा आदि के नाम तक आकर रुक जाते हैं, जबकि इसी आंदोलन में कई ऐसी महिलाएं भी रहीं, जिन्होंने देश और समाज के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और स्वाधीनता संग्राम में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। जिन महिलाओं की बहादुरी के किस्सों को साहित्य या पाठ्य पुस्तकों में स्थान मिल गया, उनके बारे में, उनके योगदान के बारे में देश को पता चल गया, लेकिन बड़ी संख्या में देश के दूरदराज के अंचल से स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लेने वाली ललनाओं का मातृभूमि के लिए किया गया त्याग अलक्षित रह गया।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में इन्हीं में से बहुत सी महिला स्वाधीनता सेनानियों को याद करने का एक सुअवसर देता है, उदाहरण के लिए जानकी अति नहप्पन को ही देखें, जो बाद में जानकी देवर के नाम से जानी गईं, मलाया के एक संपन्न तमिल परिवार में पल-बढ़ और पढ़ रही थीं। वह जब मात्र 16 वर्ष की थीं, तब उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक अपील सुनी, जिसमें उन्होंने भारतीयों से यह अपील की थी कि वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जो कुछ भी बन पड़े, सहयोग करें। जानकी ने अपनी सोने की बालियां उतारकर दान में दे दीं और पिता की आपत्ति के बावजूद भारतीय राष्ट्रीय सेना की रानी झांसी रेजिमेंट में शामिल हो गईं। विलासिता में पली-बढ़ी, जानकी पहले तो सेना के जीवन की कठोरता के अनुकूल नहीं हो सकीं, पर बाद में धीरे-धीरे उन्हें सैन्य जीवन की आदत हो गई और रेजिमेंट में उनका करियर आगे बढ़ता गया।

इसी तरह दुर्गावती देवी की बात करें तो वह केवल तीसरी कक्षा तक पढ़ी थीं, पर स्वाधीनता की चिंगारी को उन्होंने ससुराल में महसूस किया और अंग्रेजों से मुक्ति पाने के काम में जुट गईं। क्रांतिकारियों के बीच दुर्गा भाभी के नाम से मशहूर दुर्गावती देवी पिस्तौल चलाना जानती थीं और बम बनाना भी। क्रांतिकारियों तक हथियार पहुंचाना उनका एक काम था। भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की सहायता के उनके किस्से आज भी जनमानस में उनके योगदान के अनुरूप सामने नहीं आ पाए हैं। कहते हैं कि चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी, उसे दुर्गा भाभी ही लेकर आई थीं।

पंजाब के एक गांव बक्शीवाला में वर्ष 1890 में जन्मी गुलाब कौर का बचपन बहुत ही साधारण बीता। उनका विवाह मानसिंह से हुआ, जो बेहतर जिंदगी की ललक में गुलाब कौर के साथ फिलीपींस के मनीला चले गए। उनका इरादा वहां से अमेरिका निकलने का था। इसी दौरान गदर आंदोलन से जुड़े देशभक्तों का जहाज मनीला पहुंचा। मनीला से गदर पार्टी का एक जत्था भारत आने की तैयारी में था। यह जानकर गुलाब कौर ने हिंदुस्तान लौटने का मन बना लिया, लेकिन गुलाब कौर के पति मान सिंह ने भारत लौटने से मना कर दिया। इस पर गुलाब कौर पति को छोड़ देश लौट आईं। वह गदर पार्टी के प्रचार-प्रसार से संबंधित साहित्य सामग्री का वितरण करती थीं और प्रिंटिंग प्रेस पर नजर रखती थीं। वह गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं को छद्म भेष में हथियार भी सप्लाई करती थीं साथ ही संदेशों का आदान-प्रदान भी करती थीं। ऐसे ही काम के दौरान एक बार अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और राजद्रोह के जुर्म में दो साल जेल की सजा दे दी।

इंदौर के प्रतिष्ठित झंवर परिवार में जन्मी राधा देवी आजाद ने सैकड़ों मीलों की पदयात्रा की तथा गांधीजी के देशभक्ति संदेश को जन-जन तक पहुंचाया तो कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने देश में स्त्री सशक्तीकरण के लिए इतने कार्य किए कि देश के स्वाधीनता आंदोलन में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होना चाहिए। गांधीजी के नमक सत्याग्रह, महिलाओं की शिक्षा और स्वावलंबन, हस्तशिल्प, हथकरघा को बढ़ावा, थिएटर की स्थापना में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। बिहार के तत्कालीन सारण की तारा रानी श्रीवास्तव का कम उम्र में ही विवाह हो गया था। उनके पति फुलैना बाबू इलाके के रसूखदार व्यक्ति थे।

12 अगस्त, 1942 को सिवान में बड़ा प्रदर्शन हुआ और स्वाधीनता सेनानियों ने तय किया कि वे महाराजगंज थाने पर झंडा फहराएंगे। आंदोलनकारियों के साथ फुलैना बाबू और उनकी पत्नी तारा रानी भी साथ थीं। तारा रानी के पति को गोली लगी, लेकिन वह ध्वज लेकर आगे बढ़ती रहीं। इस कड़ी में कस्तूरबा गांधी, कमला नेहरू, सुभद्रा कुमारी चौहान, सुचेता कृपलानी, अरुणा आसफ अली के नाम तो बहुतों को पता हैं, पर बिश्नी देवी शाह, अक्कम्मा चेरियन, रानी वेलु नचियार, चकली इलम्मा जैसे बहुतेरे नाम हैं, जिन्होंने भारतीय नारी का मस्तक अपने शौर्य से इतिहास में अमर कर दिया।