बृज में हरि होरी मचाई का लोकगीत संग्रह 'ऊँची अटरिया' तो प्रेमचंद की समग्र जीवनी है 'कलम का सिपाही'

 

बृज में हरि होरी मचाई का लोकगीत संग्रह 'ऊँची अटरिया' तो प्रेमचंद की समग्र जीवनी है 'कलम का सिपाही'

Author: Sanjay PokhriyalPublish Date: Sat, 19 Mar 2022 03:58 PM (IST)Updated Date: Sat, 19 Mar 2022 03:58 PM (IST)
प्रेमचंद की समग्र जीवनी, पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी के लोकगीत संग्रह ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’।

हिंदी समाज द्वारा व्यापक रूप में स्वीकृत ‘कलम का सिपाही’ पुस्तक को मुंशी प्रेमचंद की पहली और प्रामाणिक जीवनी का दर्जा प्राप्त है। पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी के लोकगीत संग्रहों का मानक ग्रंथ ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’ इस समय याद किए जाने के लिए सर्वथा अनुकूल है।

यतीन्द्र मिश्र। फागुन में होली का पर्व अभी दो दिन पूर्व संपन्न हुआ है, मगर इस मौसम का रंग तो चैत्र मास तक महसूस किया जाता है। स्वाधीनता की 75वीं सालगिरह के अवसर पर हम सांस्कृतिक रूप से संपन्न कुछ ऐसे संचयनों का भी अवलोकन कर सकते हैं, जिनके कारण भारतीय पर्वों और अनुष्ठानों की व्यापकता का जयघोष होता रहता है। संगीत विद्वान और धुनों की स्वरलिपि तैयार करने में सिद्धहस्त पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी के लोकगीत संग्रहों का मानक ग्रंथ ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’संकलन लोकगीतों की विभिन्न विधाओं का ऐसा प्रतिनिधि संकलन भी है, जिसके सहारे हम उत्तर प्रदेश के विभिन्न मांगलिक अवसरों के गीतों का सम्यक विवेचन और संकलन देख सकते हैं, जिनकी स्वरलिपियां भी साथ में दर्ज की गई हैं।

Ads by Jagran.TV

यह भी देखने वाली बात है कि पूर्व में ऐसे ढेरों संकलन बनते रहे हैं, जिनमें रामनरेश त्रिपाठी की ‘कविता कौमुदी’, विद्यानिवास मिश्र की ‘चंदन चौक’ तथा डा. विद्याबिंदु सिंह की ‘ढोलक रानी मोरे नित उठि आयू’ स्मरण किए जा सकते हैं। ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’ जब पहली बार 1977 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी से प्रकाशित हुई थी, तब इसकी भूमिका लिखते हुए जयदेव सिंह ने उचित ही लक्ष्य किया था ‘काव्य की दृष्टि से जो सहज, सुबोध और मार्मिक भावों की धारा इन लोकगीतों में प्रवाहित हुई है, वह अनुपम है।’ राधावल्लभ चतुर्वेदी की यह संकलित कृति एक ऐसे समावेशी सांगीतिक संसार का संकुल बनाती है, जिसमें शास्त्रीय संगीत जैसे मनोहारी दृश्य भी उपस्थित हैं। इनमें घाटो, चैती, बिदेसिया जैसे लोकगीत भी अपनी समग्रता के साथ लोक जीवन का वृहत्तर पाठ सुलभ कराते हैं।

यह संकलन 106 लोकगीतों के चयन से बना है, जिसे 39 उपखंडों में विभक्त किया गया है। इन्हें प्रमुख रूप से संस्कार गीत, दिनचर्या गीत, ऋतु संबंधी गीत तथा उत्सव गीतों की श्रेणियों में विभक्त किया गया है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य इस संकलन का यह है कि इन खंडों के अंतर्गत ढेरों ऐसे गीतों को शामिल किया गया है, जो अब मुश्किल से मिलते हैं। वाचिक परंपरा में जल्दी उन पर बात नहीं होती या पारिवारिक अनुष्ठानों, मांगलिक अवसरों के दौरान विभिन्न उत्सवों में उन्हें स्वर देने वाली आवाजें नहीं मिलतीं। इस लिहाज से यह साहित्येतिहास की किताब भी बन जाती है, जिसमें संकलित किया गया सांगीतिक विमर्श अब दस्तावेज का रूप ले चुका है।

उदाहरण के लिए संस्कार गीतों में सरिया, टोना, ज्यौनार जैसे गीत अब कम ही गाए जाते हैं या दिनचर्या गीतों में खेत रखवाली के गीत, चकिया, पनघट और सीला बीनने के गीत अब शायद ही कोई जानता हो। ऋतु संबंधी गीतों के लंबे खंड में राछौर, सोहनी, चंद्रावलीर्, ंहडोला अब जल्दी सुनने को नहीं मिलता। गीतों की परिभाषा भी साथ में दी गई है कि ये गीत किन अवसरों पर किस तरह गाए जाते हैं। जैसे, ‘सोहनी’, एक विरह गीत है, जो वर्षाकाल में सावन के महीने में गाया जाता है। जब गांव की लड़कियां बागों में झूला झूलने के लिए इकट्ठा होती थीं, तब सोहनी गाई जाती थी- ‘एक सुधि आइ गैले नैहर की रे/मोरा बिरना गैइल परदेस हो।’ इसी तरह सोहर में मनरजना और सरिया गीतों का उल्लास भी देखने लायक है। संकलन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके सुधी विद्वान ने संकलन करते समय पाठ की शुद्धता, बोलियों की व्यापकता और गाए जाने की विधियों को परिमार्जित ढंग से प्रस्तुत करते हुए पाठ्य सामग्री को प्रामाणिक बनाया है। शायद इसी कारण उत्सव गीतों के कलेवर में रसिया, मेला गीत, लंगुरिया, झूमर, घाटो आदि का चयन आदर्श बन पड़ा है।


प्रेमचंद की समग्र जीवनी, पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी के लोकगीत संग्रह ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’।

हिंदी समाज द्वारा व्यापक रूप में स्वीकृत ‘कलम का सिपाही’ पुस्तक को मुंशी प्रेमचंद की पहली और प्रामाणिक जीवनी का दर्जा प्राप्त है। पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी के लोकगीत संग्रहों का मानक ग्रंथ ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’ इस समय याद किए जाने के लिए सर्वथा अनुकूल है।

 फागुन में होली का पर्व अभी दो दिन पूर्व संपन्न हुआ है, मगर इस मौसम का रंग तो चैत्र मास तक महसूस किया जाता है। स्वाधीनता की 75वीं सालगिरह के अवसर पर हम सांस्कृतिक रूप से संपन्न कुछ ऐसे संचयनों का भी अवलोकन कर सकते हैं, जिनके कारण भारतीय पर्वों और अनुष्ठानों की व्यापकता का जयघोष होता रहता है। संगीत विद्वान और धुनों की स्वरलिपि तैयार करने में सिद्धहस्त पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी के लोकगीत संग्रहों का मानक ग्रंथ ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’संकलन लोकगीतों की विभिन्न विधाओं का ऐसा प्रतिनिधि संकलन भी है, जिसके सहारे हम उत्तर प्रदेश के विभिन्न मांगलिक अवसरों के गीतों का सम्यक विवेचन और संकलन देख सकते हैं, जिनकी स्वरलिपियां भी साथ में दर्ज की गई हैं।

यह भी देखने वाली बात है कि पूर्व में ऐसे ढेरों संकलन बनते रहे हैं, जिनमें रामनरेश त्रिपाठी की ‘कविता कौमुदी’, विद्यानिवास मिश्र की ‘चंदन चौक’ तथा डा. विद्याबिंदु सिंह की ‘ढोलक रानी मोरे नित उठि आयू’ स्मरण किए जा सकते हैं। ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’ जब पहली बार 1977 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी से प्रकाशित हुई थी, तब इसकी भूमिका लिखते हुए जयदेव सिंह ने उचित ही लक्ष्य किया था ‘काव्य की दृष्टि से जो सहज, सुबोध और मार्मिक भावों की धारा इन लोकगीतों में प्रवाहित हुई है, वह अनुपम है।’ राधावल्लभ चतुर्वेदी की यह संकलित कृति एक ऐसे समावेशी सांगीतिक संसार का संकुल बनाती है, जिसमें शास्त्रीय संगीत जैसे मनोहारी दृश्य भी उपस्थित हैं। इनमें घाटो, चैती, बिदेसिया जैसे लोकगीत भी अपनी समग्रता के साथ लोक जीवन का वृहत्तर पाठ सुलभ कराते हैं।

यह संकलन 106 लोकगीतों के चयन से बना है, जिसे 39 उपखंडों में विभक्त किया गया है। इन्हें प्रमुख रूप से संस्कार गीत, दिनचर्या गीत, ऋतु संबंधी गीत तथा उत्सव गीतों की श्रेणियों में विभक्त किया गया है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य इस संकलन का यह है कि इन खंडों के अंतर्गत ढेरों ऐसे गीतों को शामिल किया गया है, जो अब मुश्किल से मिलते हैं। वाचिक परंपरा में जल्दी उन पर बात नहीं होती या पारिवारिक अनुष्ठानों, मांगलिक अवसरों के दौरान विभिन्न उत्सवों में उन्हें स्वर देने वाली आवाजें नहीं मिलतीं। इस लिहाज से यह साहित्येतिहास की किताब भी बन जाती है, जिसमें संकलित किया गया सांगीतिक विमर्श अब दस्तावेज का रूप ले चुका है।

उदाहरण के लिए संस्कार गीतों में सरिया, टोना, ज्यौनार जैसे गीत अब कम ही गाए जाते हैं या दिनचर्या गीतों में खेत रखवाली के गीत, चकिया, पनघट और सीला बीनने के गीत अब शायद ही कोई जानता हो। ऋतु संबंधी गीतों के लंबे खंड में राछौर, सोहनी, चंद्रावलीर्, ंहडोला अब जल्दी सुनने को नहीं मिलता। गीतों की परिभाषा भी साथ में दी गई है कि ये गीत किन अवसरों पर किस तरह गाए जाते हैं। जैसे, ‘सोहनी’, एक विरह गीत है, जो वर्षाकाल में सावन के महीने में गाया जाता है। जब गांव की लड़कियां बागों में झूला झूलने के लिए इकट्ठा होती थीं, तब सोहनी गाई जाती थी- ‘एक सुधि आइ गैले नैहर की रे/मोरा बिरना गैइल परदेस हो।’ इसी तरह सोहर में मनरजना और सरिया गीतों का उल्लास भी देखने लायक है। संकलन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके सुधी विद्वान ने संकलन करते समय पाठ की शुद्धता, बोलियों की व्यापकता और गाए जाने की विधियों को परिमार्जित ढंग से प्रस्तुत करते हुए पाठ्य सामग्री को प्रामाणिक बनाया है। शायद इसी कारण उत्सव गीतों के कलेवर में रसिया, मेला गीत, लंगुरिया, झूमर, घाटो आदि का चयन आदर्श बन पड़ा है।

फागुन और होली के रंग को पारिभाषित करने वाले ढेरों गीतों का संकलन इस संचयन की उत्कृष्टता में शुमार है। हमें यह जानना चाहिए कि वसंतोत्सव से प्रारंभ रंग गायन की परंपरा होली के बीतने के बाद रामजन्म के अवसर चैती तक जाती है। इस बीच होली का गायन चौताल, डेढ़ताल, झूमर, धमार, रसिया, होरी, चैती और उलारा के साथ अपना वैविध्य प्रकट करता है। इतने प्रकार से होली का गायन संपन्न होता है। यदि हम इन प्रकारों को होली के उत्सव के हिसाब से देखें, तो हर विधा फागुन की एक नई इबारत रचती है। झूमर में ‘मचो फाग घनघोर आज होरी झूमरी’, डेढ़ताल में ‘सखी फागुन मास नियराए’, धमार में ‘जमुना तट श्याम खेलैं होरी’, रसिया में ‘आज बिरज में होरी है रसिया’, होरी गीत में ‘मोरी भीजै रेशम चूनर हो/मैं कैसे खेलौ होरी’ तथा उलारा में ‘गिरधारी लाल गिरधारी लाल/नख पै गिरधर गिरा धरै’ गाकर उल्लास प्रकट किया जाता है। यह सब मिलकर फागुन को उसकी शर्तों पर एक बड़े पर्व में तब्दील करते हैं, जिसका सांस्कृतिक पाठ हजारों साल से वाचिक परंपरा में समृद्ध होता रहा है। ऐसे सरस, संगीत के सैद्धांतिक पक्ष को स्वरलिपियों के साथ समायोजित करके एक सुंदर प्रणयन किया गया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी लाभकारी होगा। यह ऐतिहासिक दस्तावेज एक मार्गदर्शी प्रयत्न है, जिसे हर संगीत रसिक को पढ़ना चाहिए।

jagran

ऊँची अटरिया रंग भरी

पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी

लोकगीत संग्रह

पहला संस्करण, 1977

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2018

संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली

मूल्य: 625 रुपए

---------------------------------

मयूरपंख

प्रेमचंद की समग्र और स्वीकृत जीवनी

कलम का सिपाही के जीवनीकार स्वयं प्रेमचंद के पुत्र और प्रख्यात कथाकार, संपादक अमृतराय हैं। निष्पक्षता के साथ लिखी गई यह कृति प्रेमचंद के उन पक्षों को भी समग्रता में देखने की कोशिश करती है, जिसके चलते वे एक बड़े रचनाकार के रूप में न केवल समादृत हुए, बल्कि उनकी सामाजिक और राजनीतिक समझ को भी यहां विस्तार से अध्ययन मिला है। प्रेमचंद युग के संघर्ष, जीवन यथार्थ, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के तहत मनुष्य की चेतना के स्तर पर विभिन्न आंदोलनों के प्रभाव और स्वयं कथाकार की महान रचना-यात्रा का एक जीवंत व विस्तृत ब्यौरा है यह किताब। इसे पढ़ने के साथ सहज ही विष्णु प्रभाकर की शरतचंद्र पर लिखी जीवनी ‘आवारा मसीहा’ तथा अमृतलाल नागर की तुलसीदास पर औपन्यासिक कृति ‘मानस का हंस’ याद आती हैं। प्रेमचंद की इस जीवनी में उनकी कहानियों और रचना-प्रक्रिया की पड़ताल भी मूल्यपरक और विश्लेषणात्मक ढंग से उभरी है।

jagran

कलम का सिपाही प्रेमचंद

अमृतराय जीवनी

पहला संस्करण, 1962

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2021

हंस प्रकाशन, प्रयागराज

मूल्य: 499

रुपएjagran

ऊँची अटरिया रंग भरी

पंडित राधावल्लभ चतुर्वेदी

लोकगीत संग्रह

पहला संस्करण, 1977

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2018

संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली

मूल्य: 625 रुपए

---------------------------------

मयूरपंख

प्रेमचंद की समग्र और स्वीकृत जीवनी

कलम का सिपाही के जीवनीकार स्वयं प्रेमचंद के पुत्र और प्रख्यात कथाकार, संपादक अमृतराय हैं। निष्पक्षता के साथ लिखी गई यह कृति प्रेमचंद के उन पक्षों को भी समग्रता में देखने की कोशिश करती है, जिसके चलते वे एक बड़े रचनाकार के रूप में न केवल समादृत हुए, बल्कि उनकी सामाजिक और राजनीतिक समझ को भी यहां विस्तार से अध्ययन मिला है। प्रेमचंद युग के संघर्ष, जीवन यथार्थ, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के तहत मनुष्य की चेतना के स्तर पर विभिन्न आंदोलनों के प्रभाव और स्वयं कथाकार की महान रचना-यात्रा का एक जीवंत व विस्तृत ब्यौरा है यह किताब। इसे पढ़ने के साथ सहज ही विष्णु प्रभाकर की शरतचंद्र पर लिखी जीवनी ‘आवारा मसीहा’ तथा अमृतलाल नागर की तुलसीदास पर औपन्यासिक कृति ‘मानस का हंस’ याद आती हैं। प्रेमचंद की इस जीवनी में उनकी कहानियों और रचना-प्रक्रिया की पड़ताल भी मूल्यपरक और विश्लेषणात्मक ढंग से उभरी है।

jagran

कलम का सिपाही प्रेमचंद

अमृतराय जीवनी

पहला संस्करण, 1962

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2021

हंस प्रकाशन, प्रयागराज

मूल्य: 499

रुपए