कोविड में माता-पिता को खोने वाले बच्चों के सुरक्षित हों संपत्ति के अधिकार, राष्ट्रीय बाल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में उठाई आवाज

 

बाल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कोविड से माता-पिता खोने वाले बच्चों के संपत्तियों पर अधिकार सुरक्षित हों।

राष्ट्रीय बाल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा है कि कोविड महामारी में माता-पिता खोने वाले बच्चों की संपत्तियों पर अधिकार सुरक्षित किए जाने चाहिए। न्यायमित्र ने भी अपने नोट में बाल आयोग की चिंताओं पर ध्‍यान दिलाया है।

नई दिल्ली। राष्ट्रीय बाल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि कोविड महामारी में माता-पिता खोने वाले बच्चों की संपत्तियों पर देनदारियों का निवारण किया जाए और संपत्ति पर उनके अधिकार सुरक्षित किए जाएं। बाल आयोग ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कही है। सोमवार को सुनवाई के दौरान न्यायमित्र ने भी अपने दाखिल नोट में बाल आयोग की ओर से उठाए गए इस मुद्दे को उद्धत करते हुए कोर्ट से उचित आदेश देने की संस्तुति की। कोर्ट इस मामले पर चार अप्रैल को विचार करेगा। इन बच्चों की पढ़ाई और स्कूल जाना सुनिश्चित होने के बारे में भी उसी दिन सुनवाई होगी।

सभी राज्यों को दिया था निर्देश

सुप्रीम कोर्ट कोविड में माता-पिता खोने वाले बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा आदि पर सुनवाई कर रहा है। इस बारे में कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि वे ऐसे बच्चों की पहचान कर उनका ब्योरा राष्ट्रीय बाल आयोग के पोर्टल बाल स्वराज पर डालें। इसके अलावा कोर्ट स्ट्रीट चिल्ड्रन के पुर्नवास के मुद्दे पर भी सुनवाई कर रहा है।

यह की गई है मांग

सोमवार को मामला जस्टिस एल. नागेश्वर राव और बीआर गवई की पीठ के समक्ष लगा था। न्यायमित्र गौरव अग्रवाल ने कोर्ट में दाखिल अपने नोट में बाल आयोग के हलफनामे में कोविड में अनाथ हुए बच्चों की संपत्ति के बारे में जताई गई चिंता का मुद्दा उठाया। साथ ही ऐसे बच्चों की पढ़ाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि अब स्कूल खुल गए हैं, कोर्ट राज्यों को निर्देश दे कि वे इस बात की जांच करें कि ऐसे सभी बच्चे स्कूल जा रहे हैं या नहीं।

अगले सोमवार को विचार करेगा कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि मामला महत्वपूर्ण है और वह इस पर अगले सोमवार को विचार करेगा। साथ ही कोर्ट को बताया गया कि बाल आयोग की स्ट्रीट चिल्ड्रन के पुनर्वास की नीति पर छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी भी राज्य ने जवाब नहीं दिया है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

बाल स्वराज पोर्टल पर अपलोड हो ब्‍यौरा

बाल आयोग ने दाखिल हलफनामे में कहा है कि ऐसे बच्चों की संपत्तियों का पूरा ब्योरा बाल स्वराज पोर्टल पर अपलोड किया जाना चाहिए। जिसमें संपत्तियों पर लिया गया कर्ज, बीमा आदि सभी तरह का ब्योरा होना चाहिए। जिलाधिकारी (डीएम) और जिला कलेक्टर (डीसी) ऐसे बच्चों की संपत्तियों की वित्तीय देनदारियों, संपत्ति के बंधक होने या बीमा प्रीमियम आदि पर ध्यान दें।

मिलकर निराकरण करें

बाल आयोग ने यह भी कहा है कि बैंकों के मुखिया डीएम और डीसी की निगरानी में बैंक और बीमा कंपनियों आदि के साथ मिलकर इसका निराकरण करें। डीएम और डीसी माता-पिता द्वारा छोड़ी गई संपत्ति पर बच्चों का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए उस संपत्ति पर यथास्थिति कायम रखें।

बच्चों का अधिकार सुरक्षित होना चाहिए

बाल आयोग के इस सुझाव की तरफदारी करते हुए न्यायमित्र गौरव अग्रवाल ने अपने नोट में सुझाव दिया कि डिस्ट्रिक लीगल सर्विस अथारिटी ऐसे मामलों में संपत्ति पर बच्चों का अधिकार सुरक्षित होना सुनिश्चित रख सकती है।

बाल आयोग दिए कई उदाहरण

बाल आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने दैनिक जागरण से बातचीत में ऐसे दो-तीन उदाहरण दिए। उन्होंने बताया कि एक मामले में तो शिकायत दिल्ली की ही थी जिसमें अनाथ बच्चों के पड़ोसियों ने आयोग को शिकायत की। दिल्ली में चार बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने कोविड में माता-पिता दोनों खो दिए। सबसे बड़ी बेटी 13 वर्ष की, दूसरी करीब नौ वर्ष की और दो जुड़वां भाई डेढ़-डेढ़ वर्ष के हैं। बच्चे अपने बुजुर्ग दादा-दादी के साथ रहते हैं।

दिल्‍ली के मामले को लिया संज्ञान

बाल आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो के मुताबिक मकान पर पिता ने कर्ज लिया था, बैंक किस्तें जमा न होने पर कुर्की की कार्रवाई के लिए पहुंच गया था। जिसकी शिकायत पड़ोसियों ने आयोग से की। कानूनगो बताते हैं कि दिल्ली सरकार को कोई जानकारी ही नहीं थी और न ही इन बच्चों का ब्योरा पोर्टल पर अपलोड था। आयोग ने संबंधित डीएम को बुलाया और अब संबंधित बैंक को नोटिस भेजा जाएगा।

बीमा कंपनी नहीं दे रही थी रकम

दूसरा मामला गुजरात के बडोदरा का था, जिसमें बच्चों ने माता-पिता दोनों खो दिए। मकान के लिए पिता ने कर्ज लिया था और कर्ज इंश्योर्ड भी था, लेकिन बीमा कंपनी पैसे नहीं दे रही थी। आयोग के दखल देने और संबंधित डीएम के प्रयास से बीमा कंपनी ने मकान का पैसा अदा किया। दो मामले मध्य प्रदेश में धार के थे, जहां एक मामले में बैंक पिता द्वारा लिए गए दो लाख के कर्ज की मांग कर रहा है।

...ताकि कोई बच्‍चा छूटने ना पाए

दूसरे मामले में दो बच्चे अनाथ हुए थे लेकिन भाई-बहन में एक का ही ब्योरा पोर्टल पर अपलोड किया गया है। आयोग ने कोर्ट से कहा है कि राज्यों को निर्देश दिया जाएं कि वे एक बार फिर जांच कर लें ताकि अगर कोई बच्चा छूट गया हो तो उसका ब्योरा भी अपलोड हो जाए। कानूनगो कहते हैं कि संपत्ति पर बच्चों के अधिकार सुरक्षित करने की जरूरत है ताकि उनके बड़े होने तक संपत्ति खुर्दबुर्द न हो जाए। यथास्थित कायम रहे।