RSS चीफ मोहन भागवत बोले- 'जैसे राम सेतु को नई पीढ़ी मानने लगी है, वैसे ही वह सरस्वती नदी को भी मानेगी'

 

द्विरूपा सरस्वती' पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में बोलते मोहन भागवत। ध्रुव कुमार

आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) में द्विरूपा सरस्वती पुस्तक का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि इसके लिए बड़े स्तर पर शोध आवश्यक है। क्योंकि आज की पीढ़ी उसे मानने लिए पहले प्रमाण मांगती है।

नई दिल्ली, संवाददाता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गौरवपूर्ण प्राचीन सनातन संस्कृति की पुर्नस्थापना के लिए सांस्कृति धरोहरों के प्रमाणीकरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए बड़े स्तर पर शोध आवश्यक है। क्योंकि आज की पीढ़ी उसे मानने लिए पहले प्रमाण मांगती है। शिक्षा व्यवस्था आस्था को बढ़ावा नहीं देती है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास विश्व को भी नई दिशा देगा, क्योंकि अभी तक हमें यहीं बताया जाता रहा है कि हमारे पास जो कुछ है वो दुनियां ने दिया, हमने सब कुछ दुनियां से लिया। हमारा अपना कुछ नहीं है। हमने केवल दुनियां की नौकरी की है।

सरसंघचालक ने कहा कि अगर भारत को फिर से विश्व गुरू बनाना है। विश्व में अपनी हैसियत बनानी है तो सनातन प्राचीनता को फिर से स्थापित करना पड़ेगा। इसके लिए सभी को जोर लगाना हाेगा। क्योंकि इसके गौरवपूर्ण प्राचीन धरोहरों और मान्यता को लेकर धूर्तों द्वारा इतनी बार झूठ बोला गया।

इसके साथ ही ऐसे प्रमाण खड़े किए। उन्होंने अपनी भाषाएं तथा और सारी बातें स्थापित की जिससे हम उनके द्वारा बनाई गई गुलामी की मानसिकता के शिकार हो गए। अपने इतिहास को ही भूल गए। उस विस्मृति को हटाने के लिए प्रमाण आवश्यक है।

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वह जनपथ होटल स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) में "द्विरूपा सरस्वती' पुस्तक के विमोचन अवसर को संबोधित कर रहे थे। यह पुस्तक सरस्वती नदी के इतिहास और प्रमाणित करते दस्तावेजों का संकलन है। इसे आइजीएनसीए के ट्रस्टी डा. महेश शर्मा व मानद सचिव सच्चिदानंद जोशी ने संपादित किया है। उन्होंने कहा कि जैसे राम और रामायण के साथ राम सेतु को मौजूदा पीढ़ी मानने लगी है। वैसे ही वह सरस्वती नदी को भी मानेगी। जिसपर एक बड़े वर्ग की श्रद्धा है। एक देवी और एक नदी के रूप में। उन्हाेंने कहा कि सरस्वती नदी का तीन किमी के हिस्सा प्रमाणित हुआ है। अब उद्गम स्थल और पूरे मार्ग काे तलाशना होगा।

इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि इतिहासकारों द्वारा भारत के लोगों को लेकर तोड़मरोड़ कर भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किए कि ये आर्य हैं, जो दूसरे देशों से आए है, लेकिन कहां से आए हैं। ये उन्हें नहीं पता। पूर्व में वाजपेयी सरकार के समय में इतिहास की तथ्यात्मक गलतियां को दूर करने की मांग तेज हुई। संसद तक में विमर्श तेज हुआ। उसका परिणाम यह हुआ कि इसके प्रमाण आने लग गए हैं कि हमने ही बाकि विश्व को दिया है, उनसे लिया कुछ नहीं है।

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डा. महेश शर्मा ने पुस्तक का परिचय देते हुए बताया कि आज जिस तरह से विकसित देशों ने विश्व को जहां लाकर खड़ा कर दिया है। उससे मानव सभ्यता के सामने संकट गहरा गया है। ऐसे में सरस्वती नदी के विलुप्त होने के बारे में खोजकर उससे सबक पूरे विश्व को बचाने का सबक दे सकेंगे कि कौन सी गलियां हुई जिसे नहीं दोहराना है। इसके साथ ही आर्य की थ्योरी का तर्कों के साथ जवाब दे सकेंगे।

डा सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि सरस्वती के बारे कहा जाता है कि यह आठ हजार साल पहले तक अविरल रूप से बहती थी, लेकिन महाभारत काल में विलुप्त होने लगी। ऐसा क्यों हुआ। यह पुस्तक उसका जवाब तलाशने का प्रयास करती है। इस अवसर पर बद्रीनाथ के माणा गांव में बनी सरस्वती मंदिर के लिए

101 किलो का घंटा भी भेंट किया गया तथा प्रसिद्ध पुरातत्वविद डा बीबी लाल पर एक वृत्त चित्र की प्रस्तुति हुई।