आखिर चंडीगढ़ पर कौन-कौन जता रहा है अपना हक, पांच दशक बाद भी क्यों नहीं सुलझ पाया यह मामला

 

चंडीगढ़ पर न पंजाब अपना हक छोड़ेगा और न ही हरियाणा।

पंजाब विवि के इतिहासकार व सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो. गुरदर्शन ढिल्लों ने बताया कि हल निकालना इतना आसान नहीं है। भाषा के आधार पर जब पंजाब का विभाजन हुआ और हरियाणा बना उस समय से ही मामला उलझ गया।

चंडीगढ़, राज्य ब्यूरो। चंडीगढ़ को लेकर पंजाब और हरियाणा के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद इस हफ्ते तब और भड़क गया जब केंद्र ने केंद्र शासित प्रदेश में कर्मचारियों के लिए पंजाब सर्विस रूल्स के बजाय सेंट्रल सर्विस रूल्स अधिसूचित किए। केंद्र ने पहले भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) में नियुक्तियों के नियमों में बदलाव किया था। वहीं, शुक्रवार को पंजाब विधानसभा ने विशेष सत्र में चंडीगढ़ पर राज्य के दावे को दोहराते हुए सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया। शनिवार को हिमाचल ने भी दावा पेश कर दिया।

चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी कब और कैसे बनी?

विभाजन के बाद भारत के हिस्से में आए पंजाब की अस्थायी राजधानी शिमला बनाई गई थी। अविभाजित पंजाब की राजधानी के रूप में लाहौर की पहले से ही एक स्थापित और भव्य विरासत थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पंजाब को अलग पहचान देने के लिए इसकी राजधानी के रूप में एक आधुनिक शहर चाहते थे और इसी परिपेक्ष्य में चंडीगढ़ की कल्पना की गई थी।

1966 के पंजाब पुनर्गठन अधिनियम ने अविभाजित पंजाब से हरियाणा को अलग गठित किया गया। चंडीगढ़ हरियाणा को सौंप दिया गया। जब इसका जोरदार विरोध हुआ तो चंडीगढ़ को नया केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया और इसे दोनों राज्यों की राजधानी घोषित कर दिया गया।

  • मार्च 1948 में, पंजाब सरकार ने केंद्र के परामर्श से नई राजधानी के स्थल के रूप में खड्ड तहसील को चुना और यहां 22 गांवों को अधिग्रहण किया गया। सरकार ने उनके विस्थापित निवासियों को मुआवजा दिया।
  • 21 सितंबर, 1953 को पंजाब की राजधानी को आधिकारिक तौर पर शिमला से चंडीगढ़ ले जाया गया। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 7 अक्टूबर, 1953 को नई राजधानी का उद्घाटन किया। हरियाणा राज्य के गठन से पहले तक चंडीगढ़ पूर्ण रूप से पंजाब की राजधानी बना रहा।

फिर इस तरह हुआ बंटवारा

चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा दोनों की सामान्य राजधानी के रूप में स्थापित किया गया। संपत्तियों को राज्यों के बीच 60-40 के अनुपात में विभाजित किया गया। हरियाणा से कहा गया था कि वह पांच साल तक चंडीगढ़ में कार्यालय और आवासीय आवास का उपयोग तब तक करे जब तक कि वह अपनी राजधानी नहीं बना लेता। केंद्र ने हरियाणा को 10 करोड़ रुपये का अनुदान और नई राजधानी के निर्माण के लिए समान राशि के ऋण की भी पेशकश की थी।

राजधानी बनते ही चंडीगढ़, पंजाब में शामिल हो जाएगा

केंद्र सरकार ने तब दलील दी थी कि उसने शहर (चंडीगढ़) को विभाजित करने के खिलाफ फैसला इसलिए कि इससे चंडीगढ़ शहर की खूबसूरती, वास्तुकला और ले-आउट प्रभावित होगा। चंडीगढ़ ने तब तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी। ..और हरियाणा जितनी जल्दी अपनी राजधानी बना लेगा, चंडीगढ़ उतनी ही जल्दी पंजाब में शामिल हो जाएगा।

26 जनवरी 1986 को सौंपना था

24 जुलाई 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच राजीव-लोंगोवाल समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। अन्य बातों के अलावा, केंद्र ने चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने पर सहमति बनी। 26 जनवरी, 1986 को वास्तविक हस्तांतरण की तारीख तय की गई। हालांकि, समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने से भी कम समय के बाद, लोंगोवाल की आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी।

सात प्रस्ताव आए

  • पंजाब विधानसभा में शुक्रवार को चंडीगढ़ पर दावा पेश करने वाला अपनी तरह का सातवां प्रस्ताव था।
  • 18 मई, 1967 को आचार्य पृथ्वी सिंह आजाद द्वारा लाया गया था।
  • 19 जनवरी 1970 को चौधरी बलबीर सिंह द्वारा दो प्रस्ताव लाए गए। उस समय गुरनाम सिंह की सरकार थी ।
  • 7 सितंबर 1978 को एक प्रस्ताव लेकर आए, जब प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे।
  • बलदेव सिंह मान ने 31 अक्टूबर 1985 को सुरजीत सिंह बरनाला की सरकार के दौरान एक समान प्रस्ताव लाया।
  • 23 दिसंबर 2014 को बादल सरकार के दौरान गुरदेव सिंह झूलन एक प्रस्ताव लेकर आए। बरनाला की सरकार के दौरान भी एक प्रस्ताव लाया गया था।
  • मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार शुक्रवार को सातवां प्रस्ताव लेकर आई