सच्चे खिलाड़ी वही हैं, जो जुनून के साथ अपने लक्ष्य पर रहते हैं फोकस

 

शांति और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस पर मिलते हैं देश के कुछ ऐसे किशोर-युवा खिलाड़ियों से...

International Sports Day 2022 किसी भी खेल के खिलाड़ी हों तमाम कठिनाइयों व अभावों के बीच भी जीतने का जज्बा लिए आगे बढ़ते रहते हैं। खेल हमें शांति और मेलजोल का पाठ पढ़ाते हुए तरक्की के लिए प्रेरित करते हैं।

 भारतीय क्रिकेट को शीर्ष पर पहुंचाने वाले महान क्रिकेटर कपिल देव का कहना है कि सच्चे खिलाड़ी वही हैं, जो जुनून के साथ अपने लक्ष्य पर फोकस रहते हैं। वे अभाव से विचलित नहीं होते। यह जज्बा ही स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कहलाता है। ऐसा जज्बा रखने वाले खिलाड़ी यह मानते हैं कि जीत बेशक मायने रखती है, पर हार से भी टूटना नहीं है, किसी से द्वेष नहीं रखना है, बल्कि अपनी कमियों को सुधारकर आगे बढ़ने का हुनर सीखना है।

अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस-2022 : विकास और शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस (इंटरनेशनल डे आफ स्पोर्ट फार डेवलपमेंट ऐंड पीस, आइडीएसडीपी) संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहली बार छह अप्रैल, 2014 को मनाया गया था। उसके बाद खेलकूद के महत्व को बढ़ावा देने के लिए इसे हर वर्ष मनाया जाने लगा। इस वर्ष इस दिवस का विषय है- ‘सबका सतत विकास और शांतिपूर्ण भविष्य बनाने में खेल का योगदान’।

हाकी के होनहार: रायबरेली (उप्र) के अहियारायपुर निवासी रौनक हाकी खिलाड़ी हैं। पिता कमलेश कुमार सोनकर फलमंडी में काम करते हैं। गत फरवरी में भारतीय खेल प्राधिकरण के बरेली केंद्र के लिए उनका चयन हुआ है। हाकी खिलाड़ी नैना के पिता वीरेंद्र सोनकर की पंक्चर जोड़ने की दुकान है। नैना का चयन भारतीय खेल प्राधिकरण पटियाला में हुआ है। हाकी खिलाड़ी कुमकुम के पिता तिलकराज विक्रम दिहाड़ी मजदूर हैं, तो मां जया दूसरों के घरों में काम करती हैं। कुमकुम प्रदेश टीम से खेल रही हैं। लखनऊ में चल रहे खेलो इंडिया महिला हाकी लीग 2021-21 में वह उत्तर प्रदेश टीम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली भारतीय महिला हाकी टीम की सदस्य मुमताज खान लखनऊ से हैं। पिता हफीज खान कैंट के तोपखाना इलाके में सब्जी का ठेला लगाते हैं। मां कैंसर से जूझ रही हैं।

प्रयागराज के रसूलपुर निवासी जैनुल आबिदीन ने नौ साल की उम्र तक स्टिक नहीं पकड़ी थी, पर एक बार उपहार में मिली स्टिक ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने अखिल भारतीय अंडर-14 में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया है। गाजीपुर के हाकी खिलाड़ी राजकुमार पाल के पिता ट्रक चलाते थे, पर बेटा आज सीनियर इंडिया हाकी टीम में है। राउरकेला (ओडिशा) की ज्योति छेत्री के पिता राजमिस्त्री व मां श्रमिक हैं, लेकिन ज्योति पांच सब जूनियर, पांच जूनियर व तीन सीनियर राष्ट्रीय मैच खेल चुकी हैं। राउरकेला की एक और हाकी खिलाड़ी किशोरी टोप्पो की माली हालत भी ऐसी ही है। पर वे गांव के मैदान से अंतरराष्ट्रीय मैचों तक पहुंच बना चुकी हैं।

खेल ने अनुशासित कर दिया: सुल्तानपुर (उप्र) की शिवांगी सिंह वेट लिफ्टिंग में अब तक दर्जनभर से अधिक मेडल अपने नाम कर चुकी हैं। वह कहती हैं, ‘इस खेल में आकर जाना कि आप अनुशासन के बिना कुछ हासिल नहीं कर सकते।’ वहीं, अमृतसर के बाक्सर जश्नप्रीत सिंह कहते हैं, ‘खेल से जो सबसे अनमोल चीज मिली, वह है अनुशासन। अनुशासन हर जगह मुङो लाभ पहुंचाता है।’

बदल गया व्यक्तित्व: जूनियर विश्व एथलेटिक्स मीट में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली झारखंड की एथलीट सपना कुमारी ने कभी नहीं सोचा था कि वह अंतरराष्ट्रीय एथलीट बनेंगी, पर उन्होंने अपनी दीदी को दौड़ते देख यह सपना देखा और इसे पूरा भी किया। 2018 में श्रीलंका में आयोजित साउथ एशियन जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सपना ने 100 मीटर हर्डल में स्वर्ण पदक जीता। खेल ने उनके भीतर क्या बदला? इस पर वह कहती हैं, ‘पहले मुङो नये लोगों से मिलने में ङिाझक होती थी, लेकिन अब मैं बदल गयी हूं। मुझमें भरपूर आत्मविश्वास आ गया है। खुद को सशक्त महसूस करती हूं।

लहराऊंगा तिरंगा: सुल्तानपुर (उप्र) के अमृतांशु चौरसिया अंतरराष्ट्रीय किक बाक्सिंग प्रतियोगिता के लिए चयनित हुए हैं। इसी साल डबलिन आयरलैंड में होने वाली विश्व चैंपियनशिप के लिए दूसरे स्टेज के ट्रायल की तैयारी में जुटे हैं। अमृतांशु कहते हैं, ‘मैंने बस यूं ही शौक-शौक में खेल प्रशिक्षण शिविर में प्रवेश लिया था, लेकिन अब मेरी जिंदगी बदल गयी है। मेरा लक्ष्य बदल गया है। मैं चाहता हूं कि विश्व चैंपियनशिप में तिरंगा लहराऊं।’

सम्मान से बढ़ा मनोबल: फेंसिंग यानी तलवारबाजी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रौशन कर चुके हैं पटियाला (पंजाब) के अजरुन वर्मा। वह कहते हैं, ‘खेल ने उनकी जिंदगी को बदल डाला है। देश-विदेश में भ्रमण करने से मेरा मनोबल बढ़ा है। खेल ही है, जिसके कारण मैं सेना में भी अपनी सेवा दे रहा हूं। मुङो बहुत सम्मान दिलाया है इस खेल ने।’

लग गए सपनों को पंख: रांची की प्रियंका केरकेट्टा आज देश की प्रतिभावान एथलीटों में शामिल हैं। वह लंबी कूद में नेशनल रिकार्ड धारक भी हैं। उन्होंने 6.30 मीटर छलांग लगाकर रेलवे की रुता पाटकर के रिकार्ड (6.25 मीटर) को तोड़ा था। वह कहती हैं, ‘खेल ने मेरे सपने को पंख दिए हैं। रोजगार दिया, जिससे मेरे घर की स्थिति बेहतर हो रही है। पहली बार जब विदेश गई थी तो काफी ङिाझक होती थी, पर अब उस ङिाझक को तोड़ चुकी हूं।’

कभी चने बेचते थे, आज हैं फुटबालर: रांची के मेसरा, नेवरी निवासी सुबोध कहते हैं, ‘घर चलाने के लिए चने बेचने के साथ मैं फुटबाल भी खेलता था। मेरा वह जुनून आज रंग ला रहा है।’ वह बताते हैं, ‘जब फुटबाल खेलना शुरू किया तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे-जैसे मैं सफल होता गया, सभी तारीफ करने लगे। जो पहले बात भी नहीं करते थे, वे आज साथ में फोटो खिंचवाते हैं।’ हरदोई (उप्र) के सैंबो के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निखिल सिंह के पिता किसान हैं। निखिल कहते हैं, ‘वल्र्ड कप में मैंने कई खिलाड़ियों को देखा कि कैसे खेल उनका जुनून बन चुका है और वे परिवार व अपनों के लिए जीते हैं। वही मंत्र मैंने भी अपना लिया है।’

इनपुट सहयोग : हरदीप रंधावा-जालंधर, गौरव सूद-पटियाला, संजीव रंजन-रांची, अनुराग श्रीवास्तव-प्रयागराज, आशीष त्रिवेदी-हरदोई, जितेंद्र सिंह-जमशेदपुर, कमल विश्वास-राउरकेला, हितेश सिंह-लखनऊ, शिवानंद राय- गाजीपुर