मां ने दूध बेचकर मनोज को सेना में भेजा, अब सब लेफ्टिनेंट बेटा, संघर्ष भरी है कहानी

 

पिथौरागढ़ निवासी मनोज भट्ट एक अप्रैल को भारतीय नौसेना में सब लेफ्टिनेंट बन गए।

पिथौरागढ़ निवासी मनोज भट्ट एक अप्रैल को भारतीय नौसेना में सब लेफ्टिनेंट बन गए। मनोज भट्ट ने बताया कि उनके पिता कृष्णानंद भट्ट हवलदार पद पर कार्यरत थे। 1995 में वह छुट्टी पर घर आए थे। तभी उनकी हार्टअटैक से मौत हो गई थी।

 हल्द्वानी : तब पिताजी छुट्टी पर घर आए थे। अचानक उनके सीने में दर्द उठा और मौत हो गई। मेरी उम्र मात्र आठ साल थी। मां ने दूध बेचकर मुझे आर्मी में भेजा। नौ सेना में सब लेफ्टिनेंट बनने की खुशी है लेकिन मां के नहीं रहने का दुख भी। पिथौरागढ़ के मनोज भट्ट ने यह दास्तां बयां की।

मूल निवासी कार्की व हाल कुशौली पिथौरागढ़ निवासी मनोज भट्ट एक अप्रैल को भारतीय नौसेना में सब लेफ्टिनेंट बन गए। दैनिक जागरण संवाददाता से हुई बात में मनोज भट्ट ने बताया कि उनके पिता कृष्णानंद भट्ट हवलदार पद पर कार्यरत थे। 1995 में वह छुट्टी पर घर आए थे। तभी उनकी हार्टअटैक से मौत हो गई।पिता की मौत से परिवार टूट चुका था। मां स्व. माधवी भट्ट ने गाय पालकर दूध बेचा। इसके बाद मुझे और मेरी दो बहनें सुनीता पुनेड़ा व नीलम कापड़ी को पढ़ाया। बीएससी प्रथम वर्ष की शिक्षा ग्रहण करते हुए नौसेना में भर्ती हो गया। इसके बाद बहनों की शादी की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई थी।

पिताजी की पेंशन आती थी लेकिन उससे सबकुछ नहीं हो पाता था। पदोन्न्ति के सोपान चढ़ते हुए वर्ष 2020 में मास्टर चीफ (सूबेदार) बने और विशेष ट्रेनिंग लेकर गोताखोर दस्ते के भी मेंबर बन गए। इसके बाद दोनों बहनों की शादी की। वर्ष 2018 में मां की भी मौत हो गई। मनोज भट्ट के ससुर कांति बल्लभ पाठक नौसेना से रिटायर्ड चीफ पेटी आफीसर और पत्नी सी सर्टिफिकेट होल्डर एनसीसी कैडेट रही हैं।

जब सब सो जाते, तब मैं पढ़ता था

मनोज भट्ट की सफलता के पीछे उनकी कड़ी मेहनत है। मनोज बताते हैं कि ड्यूटी के बाद रात को कमरे में थक हारकर आते थे। सभी साथी लाइट बंद कर सो जाते थे और वह दबे पांव उठकर स्टडी रूम में चले जाते थे। तीन से चार घंटे वह पढ़ाई करते थे। कई बार आधी रात को अधिकारियों ने उन्हें पढ़ते हुए देखा। और उन्हें आगे बढऩे के लिए गाइड किया। बीएससी से ग्रेजुएशन भी उन्होंने ड्यूटी के दौरान ही किया।

दाज्यू! जज्बा तो हर पहाड़ी के खून में हुआ

मनोज का कहना है कि उनके पिता फौज में थे। इसलिए उनका परिवार आर्मी कैंट में रहता था। वह अधिकारियों के घर में जाकर दूध बांटते थे। शाम के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाया करते थे। सहज लहजे में मनोज ने कहा कि दाज्यू आर्मी में जाने का जज्बा तो हर पहाड़ी के खून में हुआ। पिता की मौत के बाद उन्होंने ठान लिया था कि वह अफसर बनेंगे। मां का सपना भी यही था।