अब लोगों तक नहीं पहुंचेंगे वायु प्रदूषण के अप्रामाणिक आंकड़े, पढ़िए पूरी प्लानिंग

 

आंकड़े सीपीसीबी की ओर से स्थापित एयर क्वालिटी मानिटरिंग स्टेशनों से बिल्कुल अलग होते हैं।

यह समिति वायु गुणवत्ता निगरानी का फ्रेमवर्क तो तैयार कर ही रही है साथ ही यह भी देख रही है कि सीपीसीबी के एयर क्वालिटी मानिटरिंग नेटवर्क से इतर इस कार्य में सेंसर का कितना कैसे और क्या इस्तेमाल संभव है।

नई दिल्ली  surender Aggarwal। अब लोगों तक वायु प्रदूषण के अप्रामाणिक आंकड़े नहीं पहुंचेंगे। कोई भी सरकारी या गैर सरकारी एजेंसी इनका इस्तेमाल सिर्फ शोध कार्य वगैरह के लिए ही कर सकेगी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने देश भर की सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण समितियों एवं बोर्ड को इस आशय के स्पष्ट लिखित निर्देश जारी कर दिए हैं। ऐसा इसलिए, ताकि वायु प्रदूषण को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो।

गौरतलब है कि वायु प्रदूषण की बढ़ती समस्या के बीच इसका बाजार भी काफी बड़ा हो गया है। कई कंपनियां एयर इंडेक्स बताने वाले लो कास्ट सेंसर बना रही हैं। कुछ कंपनियां प्रचार के लिए इन्हें मुफ्त में ही प्रमुख चौराहों, विश्वविद्यालयों और सरकारी कार्यालयों में भी लगा देती हैं, लेकिन इनके आंकड़े सीपीसीबी की ओर से स्थापित एयर क्वालिटी मानिटरिंग स्टेशनों से बिल्कुल अलग होते हैं। वजह, सेंसर केवल प्रदूषक कण मापते हैं, जबकि सीपीसीबी की ओर से जारी होने वाले एयर क्वालिटी इंडेक्स पीएम 2.5, पीएम 10, एनओ2, एनएच 3, एसओ 2, सीओ व ओजोन इत्यादि सात प्रदूषक मानकों के मिश्रण पर आधारित होता है।

सीपीसीबी के सदस्य सचिव डा. प्रशांत गार्गवा की ओर से जारी निर्देश में यह भी बताया गया है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय की ओर से 2009 में अधिसूचित नेशनल एंबिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड (एनएएक्यूएस) देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक समान ही हैं। सीपीसीबी की ओर से विभिन्न शहरों के लिए नियमित रूप से जारी एयर इंडेक्स भी इन्हीं स्टैंडर्ड के आधार पर जारी किए जाते हैं। लिहाजा, लो कास्ट सेंसर से मिलने वाले अप्रामाणिक आंकड़े महज भ्रामक स्थिति ही उत्पन्न करते हैं।

सीपीसीबी ने अपने निर्देशों में राज्यों से यह भी साझा किया है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय ने विशेषज्ञ समिति का भी गठन किया है। यह समिति वायु गुणवत्ता निगरानी का फ्रेमवर्क तो तैयार कर ही रही है, साथ ही यह भी देख रही है कि सीपीसीबी के एयर क्वालिटी मानिटरिंग नेटवर्क से इतर इस कार्य में सेंसर का कितना, कैसे और क्या इस्तेमाल संभव है।

यही नहीं, पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इन सेंसर्स के परिणाम पर एक अध्ययन भी कराया जा रहा है कि इनसे उपलब्ध आंकड़े किस हद तक प्रामाणिक हैं। जब तक ये फ्रेमवर्क तैयार नहीं हो जाता और इस अध्ययन के परिणाम नहीं आ जाते, तब तक सेंसर से मिले आंकड़ों को सार्वजनिक करने पर पूर्णतया रोक रहेगी। इससे लोगों तक अप्रामाणिक आंकड़े नहीं पहुंचेंगे।