धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर: जीवन का अधिकार बनाम ध्वनि प्रदूषण

 

महाराष्ट्र के बाद बेंगलुरू में भी गरमाया मामला, धार्मिक स्थलों को नोटिस।

देश में छिड़ी बहस को तीन सवालों की कसौटियों पर कसना चाहिए। ध्वनि प्रदूषण के माध्यमों का उपयोग करना क्या उनकी पंरपरा है? क्या सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन नहीं होना चाहिए? क्या एक गलत का जवाब दूसरे गलत से दिया जाना सही है?

 नई दिल्ली: हिजाब, हलाल के बाद अब अजान को लेकर बेंगलुरू एक बार फिर चर्चा में है। मंगलवार को स्थानीय पुलिस ने लाउडस्पीकर के जरिये तय मानकों से ज्यादा ध्वनि प्रदूषण फैलाने व नियमों के उल्लंघन के आरोप में 300 धार्मिक स्थलों को नोटिस जारी किया है। महाराष्ट्र में भी यह मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है। धार्मिक स्थल पर लाउडस्पीकर बजाने को लेकर छिड़ी धार्मिक व राजनीतिक बहस के बीच एक कानूनी पहलू भी है, जिसके आधार पर ही निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट अब तक कई आदेश दे चुके हैं। क्या है यह कानूनी पहलू? ध्वनि प्रदूषण का सामाजिक जीवन पर कितना असर व क्या कहते हैं विशेषज्ञ, पढि़ए यह रिपोर्ट:

कानून की बात: अगर इस संदर्भ में कानून की बात करें तो ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) 2000 के अंतर्गत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने चार अलग-अलग प्रकार के क्षेत्रों के लिए ध्वनि मानदंड रखा है। औद्योगिक क्षेत्र के लिए क्रमश: दिन व रात में 75 और 70 डेसीबल, वाणिज्यिक क्षेत्रों के लिए 65 और 55, आवासीय क्षेत्र के लिए 55 और 45 और शांत (साइलेंट) क्षेत्रों के लिए 50 व 40 डेसीबल की मात्रा निर्धारित की है। डेसीबल ध्वनि मापने की मात्रा है। यहां पर दिन का समय सुबह छह से रात 10 बजे तक और रात का समय 10 से सुबह छह बजे तक माना जाता है। वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने असहनीय या मानक से ज्यादा ध्वनि को प्रदूषण का अंग ही माना था।

कारावास व जुर्माने का प्रविधान : पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम 2000 के उल्लंघन पर कारावास और जुर्माने का प्रविधान है।

दो सख्त आदेश, दोनों की अवहेलना : सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2005 के आदेश के अनुसार रात 10 से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जा सकता है। वहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष 2020 में फैसला दिया कि अजान इस्लाम का एक हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का हिस्सा नहीं है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता विराग गुप्ता कहते हैैं कि ध्वनि प्रदूषण जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ मामला है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) ए और अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को बेहतर वातावरण और शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। यह सर्वोपरि है। किसी भी स्तर पर इसका उल्लंघन हो रहा हो, कानूनन यह गलत है।

ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव : ध्वनि प्रदूषण का दुष्प्रभाव मनुष्यों पर ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों पर भी पड़ता है। व्यवहार में चिड़चिड़ापन आना व सहनशक्ति कम होना शामिल है। लंबे समय में यह उच्च रक्तचाप, श्रवण शक्ति कम होना, नींद में गड़बड़ी जैसी परेशानियों का भी कारक बनता है।

हम कई वर्षों से कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों व वहां के प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर बंद करवाए जाएं क्योंकि यह तय मानकों से कई गुना तीव्र होते हैं। यह सभी धर्मों के लिए लागू हो। एक देश, एक कानून होना चाहिए और सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

-मुन्ना कुमार शर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदू महासभा

किसी भी धर्मस्थल या सार्वजनिक इमारत में लाउडस्पीकर नहीं लगना चाहिए। 19वीं शताब्दी से एशियाई देशों में इसका चलन बढ़ा। यूरोप में भी एशियाई आबादी बढऩे के साथ अब यह मुद्दा बनने लगा है। सरकारों को इस मामले की गंभीरता समझकर बिना भेदभाव व पक्षपात के इस पर उचित प्रतिबंध लगाना चाहिए।

-मुहम्मद सज्जाद, आधुनिक और समकालीन इतिहास के प्रोफेसर, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय