कानपुर की रुचि ने प्रबंधन छाेड़ उद्यमिता का थामा हांथ, खुशबूदार दीपों से गृहस्थी के साथ महकी दुनिया

 

कैंडल स्टाल सजाए कानपुर की रुचि कटियार।

महिलाएं आत्मनिर्भर बनने की राह पर निकल पड़ी हैं। कानपुर में प्रबंधन शिक्षिका उद्यमिता के क्षेत्र में तेजी से पांव जमाए हैं। उन्होंने अपने स्टार्टअप से न केवल अपनी गृहस्थी काे संवारा बल्कि अन्य महिलाओं को भी जोड़कर रोजगार के अवसर दिए हैं।

कानपुर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान ने इतना प्रभावित किया कि प्रबंधन शिक्षिका रहीं रुचि कटियार शिक्षण कार्य छोड़कर उद्यमिता से जुड़ गईं। न सिर्फ खुद बल्कि अन्य महिलाओं को भी रोजगार से जोड़कर चेहरों पर मुस्कान ला दी। खुशबूदार दीपों से उनकी गृहस्थी का संसार महकने के साथ समृद्धि से जगमगा रहा है।

शारदा नगर निवासी रुचि कटियार ने एमएससी, बीएड करने के बाद एमबीए किया। वर्ष 2013 से 2016 तक अंबेडकर इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियरिंग फार हैंडीकैप्ड कानपुर में दिव्यांग बच्चों को पढ़ाया। 2016 से 2017 तक हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) कानपुर के ह्यूमिनिटीज विभाग, 2017 से 2019 तक उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान (यूपीटीटीआइ) में एप्लाइड साइंस विषय में प्रबंधन पढ़ाया। इसके बाद वह कोरोना को लेकर लाकडाउन के दौरान घर पर रहीं तो उन्होंने स्टार्टअप खड़ा करने की ठानी। आनलाइन कार्यशालाओं में डिजाइनर कैंडल बनाने का प्रशिक्षण लिया। इसके लिए देश ही नहीं विदेश के शोध पत्रों से सीखा। फिर गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) में पंजीयन कराकर एसेंसियल आयल मिलाकर जेल से डिजाइनर कैंडल (मोमबत्ती) तैयार करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने फिरोजाबाद से मटकेनुमा कप मंगवाए। उनमें कैंडल तैयार कराना शुरू किया। शहर के साथ कई जिलों तक अपने उत्पाद की प्रदर्शनी लगाई। आनलाइन बिक्री की शुरुआत की।

कई महिलाओं को बनाया स्वावलंबी : काम बढऩे पर रुचि ने मोहल्ले की सोनाली, ज्योति, साहिबा और ऋचा को अपने साथ जोड़ा। आज वह महिलाएं भी पूरी शिद्दत से सिर्फ कैंडल ही नहीं, बल्कि बंदनवार, शुभ-लाभ के गिफ्ट आइटम तैयार करती हैं। इसके जरिए हर महिला को करीब पांच से छह हजार रुपये की आय हो जाती है। वह अपने बच्चों को ठीक से पढ़ा-लिखा पा रही हैं। उनके बच्चे भी पढ़-लिखकर बेहतर भविष्य बनाने के सपने बुनने लगे हैं। रुचि कहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का जो सपना दिखाया है, बस उसे साकार करने का लक्ष्य लेकर चल रही हैं। अगस्त से दिसंबर तक काम खूब चलता है। अब व्यवस्था बना रही हैं कि पूरे साल इसकी आपूर्ति करती रहें।