... तो इस तरह से बढ़ा चंडीगढ़ को लेकर पंजाब और हरियाणा में विवाद

 

इस तरह से बढ़ा दोनों राज्यों का विवाद

राजधानी चंडीगढ़ पर हरियाणा और पंजाब के हक के बीच कभी किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर चंडीगढ़ के लोग क्या चाहते हैं? मोटे तौर पर उनकी इच्छा अपने राज्य को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में पूर्ण विकसित करने की है।

पंचकूला। चंडीगढ़ देश के सबसे सुनियोजित शहरों में शामिल है। शिवालिक पहाड़ों की तलहटी में बसा यह खूबसूरत शहर 115 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। अपनी वास्तुकला, संरचना और डिजाइन की वजह से चंडीगढ़ न केवल देश, बल्कि दुनिया भर के विदेशी पर्यटकों को अपनी तरफ खींचने की ताकत रखता है। देश में चंडीगढ़ एकमात्र ऐसा शहर है, जो दो राज्यों पंजाब और हरियाणा की राजधानी है।

आजकल इन दोनों राज्यों के बीच चंडीगढ़ पर पूर्ण कब्जे को लेकर विवाद बना हुआ है। विवाद हालांकि नया नहीं है, पर यह तब अधिक गहरा गया, जब पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पंजाब विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर चंडीगढ़ पर अपना पूरा दावा जता दिया। ऐसे प्रस्ताव पारित कर दावे पंजाब की पिछली सरकारें भी करती रही हैं, पर हरियाणा के लिए भगवंत मान का यह कदम इसलिए अप्रत्याशित था, क्योंकि कुछ दिन पहले ही भगवंत मान हरियाणा राजभवन में होली पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल के साथ भाईचारे के रंग खेलकर गए थे।

एक नवंबर, 1966 को पंजाब से अलग हुए हरियाणा के चंडीगढ़ पर दावे को मान सरकार ने खारिज कर दिया। फिर भला, हरियाणा कहां चुप बैठने वाला था। उसने भी अपनी विधानसभा में पंजाब विधानसभा में पारित एकतरफा प्रस्ताव की निंदा करते हुए चंडीगढ़ पर तो अपना दावा बरकरार रखा ही, साथ ही पंजाब के साथ बरसों से चल रहे अंतराज्यीय विवादों के समाधान को हवा दे दी। एसवाईएल नहर का निर्माण हरियाणा के लिए सबसे अहम है, जो पंजाब सरकार नहीं बना रही है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला हरियाणा के पक्ष में आ चुका है, पर पंजाब अपने हिस्से की नहर नहीं बना रहा है, जिस कारण हरियाणा को उसके हिस्से का 19 लाख एकड़ फिट पानी नहीं मिल पा रहा है। हरियाणा में करीब 40 लाख एकड़ फिट पानी की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए यदि पंजाब अपने हिस्से की एसवाईएल नहर का निर्माण कर दे तो हरियाणा की पानी की आधी जरूरत को तुरंत खत्म हो जाएगी और आधा पानी वह जल प्रबंधन के जरिये बचाने की योजना पहले ही तैयार कर चुका है।

हरियाणा चाहता है कि केंद्र सरकार दोनों राज्यों के बीच चल रहे विवादों में हस्तक्षेप करते हुए एक ऐसी एजेंसी का निर्माण करे, जो पंजाब में खुद आगे बढ़कर एसवाईएल नहर का निर्माण कराए। पंजाब से हरियाणा के अलग होने के 56 साल बाद भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दोनों राज्यों के अंतरराज्यीय विवादों का हल नहीं हो पाया है। न केवल राजधानी चंडीगढ़, बल्कि एसवाईएल नहर के निर्माण के साथ ही चंडीगढ़ के प्रशासक पद पर हरियाणा के राज्यपाल की नियुक्ति, हरियाणा के हिंदी भाषी क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी, अलग हाईकोर्ट का निर्माण और विधानसभा के कमरों पर पंजाब के कब्जे को छुड़वाने समेत तमाम ऐसे मुद्दे हैं, जिनके त्वरित समाधान की जरूरत महसूस की जा रही है।

इस तरह से बढ़ा दोनों राज्यों का विवाद : आजादी से पहले पंजाब की राजधानी लाहौर होती थी, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में चली गई। मार्च 1948 में पंजाब के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी को नई राजधानी बनाने के लिए चिन्हित किया था। योजनाबद्ध तरीके से चंडीगढ़ को बसाकर सात अक्टूबर, 1953 को प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने इसका औपचारिक उद्घाटन कर दिया। विवाद तब शुरू हुआ, जब 1966 में हरियाणा को पंजाब से अलग कर नया राज्य बनाने के बावजूद दोनों प्रदेशों की राजधानी चंडीगढ़ को ही बनाया गया। हालांकि इसके पीछे भी तात्कालिक मजबूरियां थी। संसाधनों के हिसाब से दोनों राज्यों में चंडीगढ़ इकलौता शहर था, जो किसी नए राज्य की राजधानी बन सकता था।

पंजाब को संसाधनों का 60 प्रतिशत हिस्सा मिला, जबकि हरियाणा को 40 प्रतिशत। पंजाब का तर्क है, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि कुछ समय के लिए ही चंडीगढ़ साझी राजधानी रहेगी और बाद में पंजाब को वापस दे दी जाएगी। वर्ष 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौते के अनुसार चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की प्रक्रिया शुरू हुई तो हरियाणा में सियासी घमासान छिड़ गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल ने इसका विरोध किया और 26 जनवरी, 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। एक कवायद यह भी चली कि चंडीगढ़ को दोनों राज्यों में आधा-आधा बांट दिया जाए, पर बात नहीं बनी।

कानूनन कहीं नहीं टिकते पंजाब और हरियाणा के प्रस्ताव : पंजाब की सरकारें राजधानी पर हक को लेकर सात बार विधानसभा में प्रस्ताव पेश कर चुकी हैं तो हरियाणा में विभिन्न दलों की सरकारें पिछले दो दशकों में एसवाईएल नहर निर्माण को लेकर पांच बार प्रस्ताव पास कर चुकी हैं। इसी तरह अलग हाई कोर्ट को लेकर हरियाणा विधानसभा की ओर से वर्ष 2002, 2005 और 2017 में प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं। चूंकि तीनों मामले अंतरराज्यीय हैं, इसलिए किसी एक पक्ष द्वारा पारित प्रस्ताव कानूनी तौर पर कहीं नहीं टिकता। हरियाणा ने पहली बार अपनी राजधानी के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास किया, जो सिर्फ पंजाब की क्रिया पर हरियाणा की प्रतिक्रिया मात्र है। केंद्र सरकार की सहमति से ही इन विवादों का निपटारा संभव है।