दिल्ली में परवरिश, पंत विव से ली उच्च शिक्षा, कूटनीति के माहिर हैं नए विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा

 

Vinay Mohan Kwatra : विनय मोहन क्वात्रा का पालन-पोषणा दिल्ली में और उत्त शिक्षा पंत विवि से हुई है।

Vinay Mohan Kwatra विनय मोहन क्वात्रा इस कदर रिश्ते सुधारने में दक्ष हैं कि जिस नेपाल के साथ कुछ समय पहले तक कड़वाहट गहरा गई थी उसके पीएम ने बीते दिनों ही भारत का दौरा किया। उनके दादा बंटवारे के समय भारत आए थे और रोहिणी में बसे।

रुद्रपुर : दिल्ली में पालन-पोषण, उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) में उच्च शिक्षा और विश्व के अलग-अलग देशों में भारत का दमदार प्रतिनिधित्व। यही पहचान है भारत के अगले विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा की। खेत-खलिहान में जिनका मन सबसे अधिक रमता है, वह कूटनीति के मैदान में धुआंधार खिलाड़ी बन चुके हैं। अमेरिका, यूरोप और चीन, कूटनीति के लिहाज से अतिमहत्वपूर्ण इन तीनों ही मिशन पर क्वात्रा ने अपनी प्रतिभा साबित की है और संभवत: इसी का पुरस्कार उन्हें देश के अगले विदेश सचिव के पद पर नामित किए जाने के रूप में मिला है।

दिल्ली विश्वविद्यालय नहीं, कृषि विश्वविद्यालय चुना

विनय मोहन क्वात्रा यूं तो दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र के रहने वाले हैं, लेकिन मूलत: उनका परिवार पाकिस्तान से आया था। उनके दादा बंटवारे के समय भारत आए थे और रोहिणी में बसे। यहीं से शिक्षा-दीक्षा आरंभ हुई और दिल्ली विश्वविद्यालय में भी प्रवेश का भी अवसर आया, लेकिन विनय मोहन ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि व पशुपालन विश्वविद्यालय में कृषि विज्ञान की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। इसकी वजह भी है, उन्हें गांव बहुत पसंद हैं और वह देश में गांवों की प्रगति के लिए शुरुआत से ही कुछ करने के इच्छुक रहे हैं। पंत विश्वविद्यालय से ही परास्नातक करने के बाद कारवां सिविल सेवा की तरफ बढ़ा और 1988 में वह भारतीय विदेश सेवा में आ गए। तब से कूटनीति के मैदान में लगातार देश की छवि मजबूत करने के काम में डटे हैं। उन्हें पढऩे लिखने का बहुत शौक है और करियर के मध्यकाल में जेनेवा में तैनाती के दौरान विनय मोहन ने ग्रेजुएट स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडीज से अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर डिप्लोमा कर अपनी शैक्षिक योग्यता के साथ कूटनीतिक समझ को भी मजबूत किया। परिवार में पत्नी पूजा और दो बेटे हैं।

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इसलिए माने जाते हैं कूटनीति में माहिर

विश्व में किसी भी देश की छवि के निर्माण में कूटनीतिज्ञों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विनय मोहन इसे भली भांति समझते हैं और यही कारण है कि केंद्र सरकार के पसंदीदा अफसरों में वह शुमार किए जाते हैैं। डिप्लोमैसी के लिहाज से बेहद अहम माने जाने वाले अमेरिका और यूरोप तथा भारत के पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों को सहेजने व भारत का पक्ष मजबूत रखने में वह अपनी दक्षता साबित कर चुके हैैं। अब उन्हें इसी का पुरस्कार मिला है। विदेश सेवा के गलियारों में चर्चा तेज है कि उन्होंने विदेश सचिव के पद के लिए कई बड़े नामों को पीछे छोड़ा है और इनमें से कुछ तो उनसे सीनियर भी हैं। इसमें यूके में भारतीय उच्चायुक्त गायत्री इस्सर कुमार (1986 बैच) और 1987 बैच की आइएफएस रुचिरा कंबोज का नाम भी है।

बहुत अहम समय हुई है नियुक्ति़

क्वात्रा की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब भारत विदेश नीति के मामले में अति महत्वपूर्ण व संवेदनशील स्थितियों में घिरा है। पड़ोसी पाकिस्तान में सत्ता संघर्ष और संवैधानिक संकट की स्थिति है, श्रीलंका में अभूतपूर्व आर्थिक आपातकाल दिख रहा है और चीन हमेशा की तरह सीमा पर बहुत भरोसेमंद नहीं दिख रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान का शासन है। यूरोप में भी स्थिति नाजुक है, रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी देशों का दबाव भारत महसूस कर रहा है। रूस के खिलाफ जाने के लिए अमेरिका समेत यूरोपीय देश भारत पर लगातार दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में एक ऐसे विदेश सचिव की आवश्यकता थी जो पश्चिम का भी अनुभव रखता हो, अमेरिका को भी समझता हो और भारत के पड़ोसी देशों की मानसिकता और सोच का आकलन करने में सक्षम ह 

फ्रेंच समेत तीन भाषाओं में सहज

विनय मोहन हिंदी और अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच भाषा बोलने में सहज हैं और इसका लाभ उन्हें फ्रांस में भारतीय राजदूत के रूप में काफी मिला। विदेश, खासकर यूरोप में स्थानीय भाषा में संवाद को लेकर लोग सहज रहते हैैं और शायद इसी कारण क्वात्रा का फ्रांस में कार्यकाल काफी सफल रहा। अगस्त 2017 से फरवरी 2020 तक विनय मोहन क्वात्रा जब पेरिस में भारतीय राजदूत की हैसियत से थे तो फ्रांस के साथ रिश्तों में कई अहम मुकाम आए। रक्षा सौदों पर बात सहजता से बनी। 36 राफेल जेट खरीद प्रक्रिया को सरल बनाने में उनकी संवादक्षता की भी भूमिका रही। साथी अधिकारी व वरिष्ठ विनय मोहन को शांतचित्त, अत्यधिक क्षमतावान और दक्ष मानते हैैं।

नेपाल से सुधारे रिश्ते

कहा जाता है कि विदेश सेवा में यूरोप में राजदूत रहने के बाद नेपाल सरीखे छोटे देश में किसी अधिकारी को आमतौर पर नहीं भेजा जाता है, लेकिन विनय मोहन को पेरिस से काठमांडू की यात्रा उनकी कूटनीतिक दक्षता व भारत के पड़ोसियों के संबंध में शानदार समझ के कारण कराई गई। उन्होंने भी सरकार को निराश नहीं किया। यह वो वक्त था जब नेपाल ने वर्ष 2020 में भारतीय सीमा के भीतर कुछ गांवों को खुद का बताते हुए अपने नक्शे में बदलाव कर बड़ा विवाद और कूटनीटिक संकट खड़ा कर दिया। नेपाल के चीन की तरफ झुकने की भी खबरें लगातार सामने आ रही थीं। ऐसे में विनय मोहन ने इस अति गंभीर स्थिति को पूरी दक्षता के साथ संभाला। वह न केवल सरकार के नुमाइंदों से लगातार मिले बल्कि नेपाल के अन्य बड़े नेताओं से भी मिलकर दोनों देशों के रोटी-बेटी के रिश्ते और साझा सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत पर विमर्श किया। इन नेताओं में नेपाल के वर्तमान पीएम शेर बहादुर देऊबा भी शामिल हैैं।

पीएमओ में भी किया काम

तीन दशक से अधिक लंबे करियर में विनय मोहन क्वात्रा ने विभिन्न पदों की जिम्मेदारी निभाई है। इसमेें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में भी किया गया काम शामिल है। अक्टूबर 2015 से 2017 तक उन्होंने पीएमओ में काम किया।

यहां रखते हैं गहरी समझ 

  • विदेश मंत्रालय के योजना और शोध विभाग के प्रमुख के तौर पर विनय मोहन ने 2013 से 2015 तक काम किया है। बाद में वह विदेश मंत्रालय में अमेरिकी विभाग के प्रमुख बने जहां उन्हें अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को करीब से समझने और तदनुसार नीतियां बनाने का अनुभव मिला। इसी समय उन्होंने कनाडा के साथ रिश्तों पर भी काम किया।
  • वाशिंगटन में भारतीय दूतावास में 2010 से 2013 तक विनय मोहन वाणिज्य संबंधी मामलों से जुड़े रहे।
  • 2003 से 2006 तक बीजिंग में पहले काउंसलर और फिर डिप्टी चीफ आफ मिशन के रूप में उन्हें चीन को करीब से समझने और भारत की कूटनीति पर इसके प्रभाव को जानने का अवसर मिला जो अब काम आ सकता है।