पंजाब में धान के सीजन में बढ़ेगा बिजली संकट, डीएसआर पर जाना ही एकमात्र विकल्प

 

पंजाब में धान सीजन में गहरा सकता है बिजली संकट। सांकेतिक फोटो

गर्मी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। इसके साथ ही बिजली की खपत बढ़ने लगी है। इस वर्ष कोयले की कमी के कारण धान के सीजन में बिजली संकट गहराने की संभावना बनी हुई है ।

 चंडीगढ़। पंजाब में गर्मी ने अप्रैल के शुरू होते ही रंग दिखाना शुरू कर दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण जिस तरह से कोयले की सप्लाई बाधित होने के साथ-साथ महंगी हो रही है उसका बिजली के उत्पादन में असर पड़ना तय है।

पावरकॉम के एक सीनियर सुपरिटेंडेट इंजीनियर ने बताया कि जिस तरह से इस साल गर्मी बढ़ रही है उससे लगता है कि यह राज्य में बिजली खपत का पिछले साल का रिकार्ड तोड़ देगी। उन्होंने बताया कि पिछले साल राज्य में बिजली की मांग 14 हजार मेगावाट को पार कर गई थी। इस साल मांग 15 हजार मेगावाट पार करने की संभावना है। यदि पावरकॉम के अफसरों की आशंका को सही मान लिया इस साल बिजली के इस संकट से निपटना मुश्किल हो जाएगा।

बता दें, पंजाब में गर्मियों में धान की रोपाई के सीजन में अचानक 6 से 7 हजार मेगावाट बिजली की खपत बढ़ जाती है। ऐसा बीस-बीस हार्स पावर के 14.50 लाख ट्यूबवेल चलने के कारण होता है, लेकिन यदि धान की रोपाई के बजाय डायरेक्ट सीडिंग राइस पद्धति पर चला जाए तो बिजली की खपत में 40 फीसद की कमी आ सकती है।

पिछले दो दशकों से डीएसआर को प्रमोट कर रहे पूर्व कृषि अधिकारी डा. दलेर सिंह का कहना है कि खेतों में बैड या मेंढ़ बनाकर धान की सीधी बिजाई करने से 40 फीसद पानी की बचत होती है। उन्होंने बताया कि पानी को दो मेंढ़ों के बीच बनी खाल में रखने से इसकी पैदावार भी पांच से दस फीसद तक बढ़ती है साथ ही धान एक सप्ताह पहले भी तैयार हो जाती है।

उन्होंने बताया कि वह बीस साल से इस विधि को प्रमोट कर रहे हैं, लेकिन 2002 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने यह तर्क देकर इसे रद कर दिया था कि धान की सीधी बिजाई में मुश्किल आती है, लेकिन अब बीस साल बाद उसी यूनिवर्सिटी ने इसकी सिफारिश कर दी है।

डा. दलेर सिंह का कहना है कि मुझे लगता है कि यह सही मौका है जब अभी से सरकार इस विधि को ज्यादा से ज्यादा प्रमोट करे। उन्होंने बताया कि पारंपरिक विधि से धान की रोपाई करने पर 22 दिन लगातार खेत में पानी को खड़ा रखना पड़ता है साथ ही दो से तीन दिन लगातार खेत में पानी भरकर जुताई करनी पड़ती है, ताकि जमीन के सारे पोर्स बंद किए जा सकें। चूंकि पंजाब में ज्यादातर जगह पर सिंचाई ट्यूबवेलों के जरिए होती है इससे बिजली की खपत बढ़ जाती है। यदि हम धान लगाने की पद्धति बदल लें तो हम चालीस फीसद से ज्यादा बिजली बचा सकते हैं।

पूर्व डिप्टी डायरेक्टर डा. दलेर सिंह ने बताया कि पिछले दो सालों से किसानों का रुझान इस ओर बढ़ा है, लेकिन इसमें सरकार की मदद की ज्यादा दरकार है। दूसरी सबसे अहम बात यह है कि इस पद्धति से धान की खेती करने से भूजल भी काफी मात्रा में बचता है। साथ ही जमीन के पोर्स बंद न होने की सूरत में हम बारिश के दिनों में पानी को जमींदोज भी कर सकते हैं।