श्रीलंका की सियासत में पर‍िवारवाद, आर्थिक संकट के बीच राजपक्षे परिवार के खिलाफ लोगों में जबरदस्‍त गुस्‍सा- जानें पूरा मामला

 

आर्थिक संकट के बीच राजपक्षे परिवार के खिलाफ लोगों में जबरदस्‍त गुस्‍सा। फाइल फोटो।

प्रदर्शनकारी राष्‍ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के इस्‍तीफे की मांग कर रहे हैं। आखिर श्रीलंका के नागरिकों को गुस्‍सा गोटबाया राजपक्षे पर क्‍यों है? इसका प्रमुख कारण परिवारवाद है। वह इस मंदी के लिए सरकार को दोषी क्‍यों ठहरा रहे हैं। कौन है गोटबाया राजपक्षे ?

नई दिल्‍ली। भारत के पड़ोसी मुल्‍क श्रीलंका आर्थिक संकट से गुजर रहा है। अब इसकी आंच श्रीलंका की सरकार तक पहुंच चुकी है। आजादी के बाद श्रीलंका में यह सबसे बड़ा आर्थिक संकट है। महंगाई चरम पर पहुंच गई है। परेशान लोग सड़कों पर उतर चुके हैं। प्रदर्शनकारी राष्‍ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के इस्‍तीफे की मांग कर रहे हैं। आखिर श्रीलंका के नागरिकों को गुस्‍सा गोटबाया राजपक्षे पर क्‍यों है? इसका प्रमुख कारण परिवारवाद है। वह इस मंदी के लिए सरकार को दोषी क्‍यों ठहरा रहे हैं। कौन है गोटबाया राजपक्षे ? आइए जानते हैं क्‍या है पूरा मामला।

सियासत पर राजपक्षे परिवार का दबदबा

1- बता दें कि श्रीलंका की सियासत में राजपक्षे परिवार का दबदबा है। मौजूदा समय में श्रीलंका सरकार में राजपक्षे पर‍िवार के पांच सदस्‍य मंत्री थे। मंत्रिमंडल में चार भाई मंत्री हैं। पांचवां मंत्री भी राजपेक्ष परिवार का बेटा है। खुद गोटबाया राजपक्षे देश के राष्‍ट्रपति हैं। उनके पास रक्षा मंत्रालय भी है। श्रीलंका के प्रधानमंत्री मह‍िंदा राजपक्षे हैं। देश के वित्‍त मंत्री बासिल राजपक्षे हैं। श्रीलंका सरकार के गठन के बाद बासिल को विदेश से बुलाकर वित्‍त मंत्रालय की ज‍िम्‍मेदारी दी गई थी। देश के सिंचाई मंत्री चमाल राजपक्षे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में खेल मंत्रालय का जिम्‍मा महिंदा राजपक्षे के बेटे नमल राजपक्षे के पास है।

2- उन्‍होंने कहा कि श्रीलंका की इस स्थिति के लिए काफी हद तक कोरोना महामारी भी जिम्‍मेदार है। कोरोना महामारी के दौर में श्रीलंका का निर्यात रुक गया। इसका सबसे ज्‍यादा असर उसके पर्यटन उद्योग पर पड़ा। श्रीलंका में पर्यटन उद्योग उसकी अर्थव्‍यवस्‍था में अहम भूमिका निभाता है। कोरोना के कारण अंतरराष्‍ट्रीय पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई। वर्ष 2019 में कोरोना की पहली लहर के दौरान श्रीलंका की पर्यटन से होने वाली आय पर खासा असर पड़ा। विदेशों में बसे नागरिकों से मिलने वाली कमाई बंद हो गई। कोरोना महामारी से निपटने के लिए सरकार को अपना खर्च बढ़ाना पड़ा, लेकिन इस संकट के पीछे केवल कोरोना महामारी को ही जिम्‍मेदार नहीं ठहरा सकते। कहीं न कहीं श्रीलंका सरकार अपने वित्‍तीय प्रबंधन में फेल हुई है। इसकी शुरुआत चीन की बड़ी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं से हुई है। चीन के कर्ज से बनने वाला हम्बनटोटा पोर्ट पर ज्‍यादा खर्च हुआ। श्रीलंका के पास साधन सीमित थे, मगर आपने बड़े काम हाथ में ले लिए।

क्‍या आर्थिक संकट के लिए राजपक्षे जिम्‍मेदार

प्रो हर्ष वी पंत कहते हैं कि जनता का आक्रोश इसलिए है कि उनकी पार्टी सत्‍ता में है। यह नाराजगी इसलिए ज्‍यादा है कि उनके परिवार के पांच सदस्‍य सरकार में शामिल हैं। इसलिए श्रीलंका की जनता उनको कुसूरवार ठहरा रही है। श्रीलंका की जनता ऐसा सोचती है कि सरकार को मालूम था कि देश के समक्ष क्‍या चुनौतियां हैं। इसके बावजूद उन्‍होंने कुछ नहीं किया। उन्‍होंने कहा कि श्रीलंका सरकार के समक्ष अब इस समस्‍या से निपटने के ज्‍यादा विकल्‍प नहीं हैं। भारत श्रीलंका की मदद कर सकता है, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं है। उधर, श्रीलंका का करीबी चीन भी मदद कर सकता है, लेकिन उसे अपने पिछले कर्ज के बकाए की चिंता है। श्रीलंका के पास एक अन्‍य विकल्‍प आईएमएफ है। आईएमएफ उसे कुछ शर्तों के साथ कर्ज दे सकता है।

आखिर कौन हैं गोटबाया राजपक्षे

  • आखिर कौन है गोटबाया राजपक्षे। क्‍या है उनकी सियासी पृष्‍ठभूमि। दरअसल, 70 वर्षीय नेता गोटबाया राजपक्षे श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई हैं। राजपक्षे का जन्म 20 जून, 1949 को श्रीलंका के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार में हुआ था। वह नौ भाई बहनों में पांचवें स्थान पर हैं। उनके पिता डीए राजपक्षे 1960 के दशक में विजयानंद दहानायके की सरकार में प्रमुख नेता थे। वह श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। राजपक्षे ने अपनी स्कूली पढ़ाई कोलंबो में पूरी की। वह 1971 में श्रीलंका की सेना में अधिकारी कैडेट के रूप में शामिल हुए।
  • गोटबाया ने साल 1983 में मद्रास विश्वविद्यालय से रक्षा अध्ययन में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। 1980 के ही दशक में उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर स्थित ‘काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल’ में प्रशिक्षण लिया था। 1991 में वह सर जान कोटेलवाला रक्षा अकादमी के उप कमांडेंट नियुक्त किए गए और 1992 में सेना से सेवानिवृत्त होने तक इस पद पर बने रहे। वह 2005 में अपने भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति चुनाव अभियान में मदद के लिए स्वदेश लौटे और श्रीलंका की दोहरी नागरिकता ली।
  • महिंदा राजपक्षे ने तमिल अलगाववादी युद्ध को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके चलते वह सिंहली बौद्ध बहुल समुदाय के प्रिय बन गए थे। गोटबाया उनके शीर्ष रक्षा मंत्रालय अधिकारी थे, जिन्होंने लिट्टे के खिलाफ सैन्य अभियान की निगरानी की थी। लिट्टे के के निशाने पर रहे राजपक्षे 2006 में इस संगठन के आत्मघाती हमले में बाल-बाल बचे थे। बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध उन्हें अपना नायक मानते हैं। वहीं, दूसरी ओर तमिल मूल के नागरिक उन्हें अविश्वास की नजर से देखते हैं। बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने वर्ष 2005 से 2014 में रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभाई थी। रक्षा सचिव रहते वह साल 2012 और 2013 में भारत के दौरे पर आए थे।