जनमानस को प्रभावित करती फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’

 

‘द कश्मीर फाइल्स’ की बुनावट सच की जमीन के अधिक करीब दिखाई पड़ती है।

इस फिल्म के माध्यम से सच जानने के बाद मैं क्या मानूं? भारतीय आजादी से पहले की स्थिति को कुछ पल के लिए मन से निकाल भी दूं तो आजादी के बाद की राजनीतिक-सांस्कृतिक चालाकियों और दोहरेपन को कैसे देखूं?

 भारतीय संस्कृति ने यहां के लोक में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के ज्ञान का ऐसा संचार किया कि वह हमारी नशों में खून बन कर दौड़ने लगा। प्राकृतिक-सांस्कृतिक तौर पर हमारा परिवेश ऐसा रहा है कि हम जीव मात्र से प्रेम करते हैं। हम अपने प्रकृति-स्वभाव के अनुरूप सिर्फ प्रेम ही कर सकते हैं। हमारे लिए प्रत्येक जीव कुटुंब है। हमारे ग्रंथों ने हमें प्रेम और प्रार्थना का ज्ञान दिया। सबमें मैं हूं और सब मुझमें हैं का श्रीकृष्ण मंत्र हमारी थाती रही।सामान्यत: 12वीं शताब्दी से इसमें बड़ा बदलाव आना शुरू हुआ, जब इस संस्कृति से बाहर के या यूं कहें बिल्कुल भिन्न संस्कृति के लोग भारत आना शुरू हुए। होमो सेपियंस जब करीब अस्सी हजार साल पहले अफ्रीका से निकले थे तो वे अन्य सभी प्रजातियों से संघर्ष करते, उनका खात्मा करते आगे बढ़े। उनकी सफलता में जो सबसे अहम बात थी उनकी संप्रेषण कला। वे दूसरी प्रजातियों से बेहतर संप्रेषण कर सकते थे। उन्होंने धरती पर करीब 18 लाख साल तक राज करने वाले होमो इरेक्टस का सफाया कर दिया।

jagran

आज पूरी दुनिया में सिर्फ होमो सेपियंस प्रजाति ही बची है। इनमें अलग-अलग संप्रदायों के बीच सत्ता का संघर्ष है, पर जीत का फामरूला आज भी वही है- संप्रेषण कला और अत्यधिक आक्रामकता। संप्रेषण कला ने आज थोड़ा और विस्तार पाया है। वह है विमर्श गढ़ने का। जिसमें एक नया सच गढ़ने की कोशिश होती है, जो मूल सच से भिन्न होता है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखने के बाद मन में यही प्रतिक्रिया आ रही थी।

भारतीय फिल्मों ने भारतीय जनमानस को सबसे अधिक प्रभावित किया है। उसकी दी हुई भाषा-संस्कृति लोक में स्थापित होना सहज होता है। अधिकांश फिल्में लेखक-डायरेक्टर की कल्पना ही होती हैं, पर गल्प की जमीन भी लोक के बीच से ही तैयार होती है। वहां भी एक विमर्श गढ़ने का प्रयास होता है, जो लेखक-डायरेक्टर के विचारों से प्रभावित होता है, पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ की बुनावट सच की जमीन के अधिक करीब दिखाई पड़ती है। सच अपने आप में कलात्मक होता है।

क्या सनातन (हिंदू) संप्रदाय में विश्वास करने वाले का दमन करने से भारत अधिक खूबसूरत होगा? उसके दमन के सच को झुठला कर झूठा विमर्श गढ़ने से भारत अधिक खुशहाल होगा? या फिर ‘प्रेम-प्रेम से आजादी’ के नारे से भारत का कल्याण होगा? यह प्रश्न सिर्फ मेरा नहीं पूरे भारत का है, जो भारत को किसी का पिछलग्गू नहीं, विश्व गुरु बनाने का सपना देखते हैं।