देश में 5.5 करोड़ लोग केवल बीमारियों पर होने वाले खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे

 

किसी बीमार की तुलना में स्वस्थ इंसान अपने जीवन में औसतन इतनी ज्यादा संपत्ति अर्जित करता है।

विभिन्न विकासशील देशों के अनुभव से पता चलता है कि जैसे-जैसे स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय बढ़ता है देखभाल सुविधाओं का उपयोग भी बढ़ता है। सार्वजनिक निवेश में वृद्धि के साथ स्वास्थ्य देखभाल सुविधा अधिक सस्ती और वहनीय हो जाएगी। इसके परिणामस्वरूप लोग स्वास्थ्य सेवा तक अधिक पहुंच प्राप्त करेंगे।

नई दिल्‍ली। दुनिया को स्वास्थ्य का ककहरा सिखाने वाले धन्वंतरी, सुश्रुत और चरक जैसे महापुरुषों के देश भारत का सेहत के मोर्चे पर पीछे होना पूरी व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न् खड़े करता है। यही कारण है कि अब पूरी व्यवस्था इस मर्म को समझकर कदम बढ़ा रही है। वर्तमान केंद्र सरकार शुरुआत से ही इस दिशा में प्रयासरत है कि कैसे समाज के अंतिम छोर पर रह रहे व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई जाएं। आयुष्मान भारत इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। इसी दिशा में हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नेतृत्व में गुजरात के केवड़िया में स्वास्थ्य चिंतन शिविर आयोजित किया गया। इसमें राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों, स्वास्थ्य सचिवों, नीति आयोग व आइसीएमआर के प्रतिनिधियों और विज्ञानियों ने हिस्सा लिया।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन कर रहे राज्यों ने अपने यहां की श्रेष्ठ व सफल प्रक्रियाओं को साझा किया और इस बात पर विमर्श हुआ कि कैसे सबके लिए सस्ती व सुलभ स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित हो। यह संभवत: पहली बार है जब विभिन्न राज्यों ने इतनी गंभीरता के साथ इस मसले पर विमर्श किया। स्वस्थ समाज का एक पहलू यह भी है कि लोग उन बीमारियों का कम से कम शिकार हों, जिनसे बचना संभव है। योग दिवस से लेकर स्वच्छ भारत और फिट इंडिया मूवमेंट तक सरकार के कई अभियान लोगों को निजी स्तर पर स्वस्थ रहने की प्रेरणा देते हैं। हमें स्वयं भी इस बात को समझना होगा कि हमारा स्वस्थ रहना स्वयं के लिए, परिवार के लिए और समाज के लिए कितना अहम है।

आंकड़े बताते हैं कि देश में 5.5 करोड़ लोग केवल बीमारियों पर होने वाले खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे हैं। बीमारियों पर खर्च व्यक्ति को शिक्षा एवं रहन-सहन पर होने वाले खर्च में कटौती के लिए मजबूर करता है। वहीं स्वस्थ व्यक्ति देश एवं समाज के विकास में ज्यादा योगदान देने में सक्षम होता है। किसी बीमार की तुलना में स्वस्थ इंसान अपने जीवन में औसतन 28 प्रतिशत ज्यादा संपत्ति अर्जित करता है। ऐसे में स्वस्थ समाज तैयार करने की दिशा में जरूरत, जागरूकता और व्यवस्था की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

आगे की राह:

टैक्स में कटौती

कुछ मदों में टैक्स की कटौती से शोध एवं अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे नई दवाओं के विकास की राह भी खुलेगी। जीवन रक्षक एवं अन्य आवश्यक दवाओं पर जीएसटी को कम किया जा सकता है।

स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण भी जरूरी

स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षित होना भी बहुत अहम है। स्वास्थ्य सेवाएं लोगों के लिए सु्गम एवं प्रभावी बनें, इसमें स्वास्थ्यकर्मियों की बड़ी भूमिका होती है। उनके प्रशिक्षण, पुनर्प्रशिक्षण और नालेज अपडेट पर ध्यान देना जरूरी है।

शहरी निकाय हों मजबूत

भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक सरकारी वित्तपोषण की आवश्यकता है। शहरी निकायों का आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही आवश्यक है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय हो, स्वास्थ्य विषय में अधिकाधिक नागरिक संलग्नता सुनिश्चित की जाए और जवाबदेही तय हो।

नए मेडिकल कालेज बनें

देशभर में एम्स की तर्ज पर मेडिकल कालेज तैयार किए जाएं। मेडिकल कालेजों में निवेश को प्रोत्साहित किया जाए। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की लागत कम होगी और गुणवत्ता में सुधार होगा।