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उनके लिए उपलब्धियां अतीत की बात होती हैं, ध्यान केवल अगले लक्ष्य पर रखते हैं।

अविनाश के नाम पर हाफ मैराथन का राष्ट्रीय रिकार्ड (एक घंटा 00.30 सेकेंड) भी है और यह उन्हें विशिष्ट एथलीट बनाता है। राष्ट्रीय रिकार्ड रखने और लगातार उन्नत करने वाला एथलीट। वह शारीरिक रूप और मानसिक रूप से काफी सक्षम हैं। इसमें भारतीय सेना की भी अहम भूमिका है।

नई दिल्ली। बीते सप्ताह शुक्रवार को अमेरिकी प्रांत कैलिफोर्निया के सैन जुआन शहर में दिग्गज एथलीटों के बीच साउंड रनिंग ट्रैक मीट में 5,000 मीटर में भारतीय एथलेटिक्स जगत का सबसे पुराना राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़ने वाले साबले तरक्की के ट्रैक पर हैं, एक सधी गति से लक्ष्य की ओर अग्रसर। इस मीट में उन्हें कोई पदक नहीं मिला, 12वें स्थान पर रहे, लेकिन इस प्रदर्शन से भारतीयों की उम्मीदें सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं। इस एथलीट की उपलब्धि का अंदाजा इस बात से लगाइए कि 5,000 मीटर उनकी मूल स्पर्धा नहीं है। वह केवल दूसरी बार ही इसमें भाग ले रहे थे और विश्व के श्रेष्ठ एथलीटों के बीच उनकी इसके लिए तैयारी भी पूरी नहीं थी। नहीं था एथलीट बनने का सपना: कहा जाता है कि प्रतिभा को छिपाया नहीं जा सकता है। इसी बात को प्रमाणित करते हैं धावक अविनाश साबले।

एथलीट बनने का जिसका कभी सपना न रहा हो, खेल की दुनिया से वास्ता न रहा हो, वह मात्र सात वर्ष के चमकदार करियर में रिकार्ड पर रिकार्ड बना रहा है, ओलिंपिक स्तर के धावकों को पछाड़ रहा है। वर्ष 2015 में भारतीय सेना के एथलेटिक्स प्रोग्राम में क्रास कंट्री रनर के तौर पर अविनाश शामिल हुए, प्रशिक्षक ने प्रतिभा को पहचाना और आज वह अमेरिका के कोलराडो में एशियाई खेल, और ओलिंपिक के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। वह विश्व चैंपियनशिप में क्वालीफाई करने वाले भारत के पहले पुरुष एथलीट हैं। टेक्निकल और मेंटल ट्रेनिंग को अपनाया: वर्षो से सूखे से जूझते महाराष्ट्र के बीड जिले के मांडवा गांव में जन्म लेने वाले अविनाश उपलब्धियों से प्यास बुझाने में माहिर हैं। हालांकि वह उपलब्धियों को याद नहीं रखते हैं और यह उनके गुरु दिवंगत निकोलाई स्नेसारेव की सीख है।

स्नेसारेव ने अविनाश को जीवनदर्शन भी दिया जिसे यह एथलीट सदैव मनसा, वाचा, कर्मणा पालन करता है। उन्हीं की सीख थी-कभी पीछे मत देखो, कभी अपनी उपलब्धियों पर गर्व मत करो। भारत में एथलेटिक्स के राष्ट्रीय कोच रहे स्नेसारेव ने यह बात अविनाश को लगभग चार वर्ष पहले तब बताई थी जब इस एथलीट का करियर आरंभ ही हुआ था। अविनाश ने टेक्निकल ट्रेनिंग के साथ मेंटल ट्रेनिंग को भी दिल से सीखा और आज ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता जोश केर को रेस में पीछे छोड़ देते हैं। भारतीय एथलेटिक्स के मुख्य कोच राधाकृष्णन नायर उन्हें एशियाई खेलों के लिए बड़ी प्रतिभा मान रहे हैं।

कोच को किया याद: जब 2021 में राष्ट्रीय खेल संस्थान पटियाला में अविनाश ने 3,000 मीटर में नया रिकार्ड बनाया, तब कोच स्नेसारेव का हृदयाघात से निधन हो गया था। अनिवाश ने कोच की याद में इंटरनेट मीडिया पर लिखा, ‘सर, आपकी सिखाई हुई बातों का पालन लगातार कर रहा था। आपके लिए कितना भी लिखूं, कम है।’सियाचिन से रेगिस्तान तक:सियाचिन की हड्डियां गलाती सर्दी हो या राजस्थान में रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गर्मी या उलझा देने वाले पूवरेत्तर के घने जंगल, अविनाश ने सैनिक के तौर पर अपनी हर तैनाती से जो सीखा है, उसे एथलेटिक्स के ट्रैक पर जीवंत कर दिया है। वह जैसे दौड़ते ही इसलिए हैं कि हर हाल में रिकार्ड बनाना है। उड़न सिख मिल्खा सिंह, उड़न परी पीटी उषा और बहादुर प्रसाद सरीखे दिग्गज एथलीटों पर गौरव करने वाले इस देश को अब अविनाश साबले से वैश्विक मंच पर पदकों की आस है, कीर्तिमानों की प्यास है।

कर दिया बहादुरी भरा काम: अमेरिका में हुई मीट में उन्होंने जिस 5,000 मीटर स्पर्धा का राष्ट्रीय रिकार्ड (13 मिनट 29.70 सेकेंड) तोड़ा, वह वर्ष 1992 से महान धावक बहादुर प्रसाद के नाम पर था। साबले ने यह दूरी 13 मिनट 25.65 सेकेंड में पूरी की। यह पहला रिकार्ड नहीं है, जो उन्होंने तोड़ा है। साबले को अब भारतीय एथलेटिक्स में रिकार्ड तोड़ने के लिए जाना जाता है। अपनी मूल स्पर्धा 3,000 मीटर स्टीपलचेज (8 मिनट 16.21 सेकेंड) में वह सात बार रिकार्ड तोड़ चुके हैं। अविनाश के नाम पर हाफ मैराथन का राष्ट्रीय रिकार्ड (एक घंटा, 00.30 सेकेंड) भी है और यह उन्हें विशिष्ट एथलीट बनाता है। अलग-अलग स्पर्धाओं के राष्ट्रीय रिकार्ड रखने और लगातार उन्नत करने वाला एथलीट। वह शारीरिक रूप और मानसिक रूप से काफी सक्षम हैं। इसमें भारतीय सेना की भी अहम भूमिका है।