आस्था व उल्लास ही नहीं मानव प्रबंधन भी सिखाता है खिचड़ी मेला, CM योगी खुद तैयार करते हैं रूपरेखा

 


मेले से लेकर मंदिर तक प्रशासनिक मशीनरी के समानांतर खड़े नजर आते हैं मंदिर के स्वयंसेवक। -जागरण

Khichdi Mela 2023 गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ स्वयं मानव प्रबंधन की रूपरेखा तैयार करते हैं। मंदिर के स्वयंसेवक खिचड़ी मेले से लेकर मंदिर तक प्रशासनिक मशीनरी के समानांतर खड़े नजर आते हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधा ही इनका लक्ष्य होता है।

गोरखपुर,। मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला परंपरागत खिचड़ी मेला केवल आस्था व उल्लास के चरम तक ही नहीं पहुंचाता, उत्कृष्ट मानव प्रबंधन भी सिखाता है। हर क्षण अपने दायित्व के प्रति समर्पित और अनुशासित मंदिर के स्वयंसेवक इस आयोजन को सुगठित प्रबंधन का पर्याय बनाते हैं। इस मानव प्रबंधन की रूपरेखा स्वयं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ तैयार करते हैं। संचालन भी उन्हीं के सीधे मार्गदर्शन में होता है। इसी का नतीजा है कि मेले की व्यवस्था स्वचालित सी दिखती है।

स्वयंसेवक संभालते हैं जिम्मेदारी

दरअसल इसके लिए मंदिर के स्वयंसेवक मकर संक्रांति से एक दिन पहले से व एक दिन बाद तक मंदिर व मेला परिसर में प्रशासनिक मशीनरी के समानांतर खड़े नजर आते हैं। हर बार सबकी जिम्मेदारी तय की जाती है, जिसके अनुसार उन्हें खिचड़ी चढ़वाने से लेकर मेले तक की व्यवस्था संभालनी होती है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सहूलियत ही इनका उद्देश्य होता है। इसमें 50-100 नहीं, करीब डेढ़ हजार लोगों को लगाया जाता है। सबकी जिम्मेदारी सप्ताह भर पहले ही तय कर दी जाती है। कार्यस्थल भी सुनिश्चित कर दिया जाता है। जिसे जिस कार्य में लगाया जाता है, वह पूरी निष्ठा के साथ उसका निर्वहन करता है। शानदार और बेहद अनुशासित मानव प्रबंधन का ही कमाल है कि मेले में कभी किसी श्रद्धालु को कोई भी दिक्कत नहीं होने पाती और विशाल आयोजन में अव्यवस्था का नामोनिशान तक नजर नहीं आया है।

बंटा होता हर स्वयंसेवक का कार्य

श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधा के लिए स्वयंसेवकों का कार्य बंटा होता है। खिचड़ी चढ़ाने के लिए लगाई जाने वाली कतार को दो भाग में बांटकर ड्यूटी लगाई जाती है। मुख्य गेट से सिंह द्वार तक महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़ी शिक्षण संस्थाओं के एनसीसी कैडेट और एनएसएस स्वयंसेवक लगाए जाते हैं। सिंह द्वार से लेकर गर्भगृह तक की व्यवस्था की जिम्मेदारी गुरु गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के छात्रों की होती है। निकास व प्रवेश द्वार पर भी स्वयंसेवकों को तैनात किया जाता है। चरण पादुका स्टैंड की जिम्मेदारी भी कुछ स्वयंसेवकों को ही दी जाती है। मंदिर के भंडारा व्यवस्था में 100 के करीब लोगों का काम निर्धारित किया जाता है, जिसमें प्रसाद बनाने वाले और उसे वितरित करवाने वाले अलग-अलग होते हैं। खिचड़ी चढ़ाने के बाद उसे आस्था के साथ इकट्ठा करके सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए भी संस्कृत विद्यापीठ के छात्र व शिक्षक लगाए जाते हैं। इसके अलावा कुछ स्वयंसेवक यूं ही मेले में भ्रमण के लिए लगाए जाते हैं, जो देखने में मेला का हिस्सा लगते हैं पर होते व्यवस्था का हिस्सा हैं।

24 व 12 घंटे की ड्यूटी का है मानक

मंदिर प्रबंधन के डॉ. प्रदीप कुमार बताते हैं कि स्वयंसेवकों की ड्यूटी 24 घंटे और 12 घंटे के मानक पर लगाई जाती है। 24 घंटे की ड्यूटी को आठ घंटे की शिफ्ट में बांटा जाता है जबकि 12 घंटे को छह-छह घंटे में। 24 घंटे की ड्यूटी से संस्कृत विद्यापीठ के शिक्षक व छात्रों के अलावा मंदिर के कर्मचारियों और शिक्षकों से जोड़ा जाता है जबकि 12 घंटे के मानक पर ड्यूटी एनसीसी कैडेट व एनएसएस के स्वयंसेवकों की लगाई जाती है। स्वयंसेवकों को एक परिचय पत्र इस हिदायत के साथ दिया जाता है कि वह इसका उपयोग मंदिर परिसर से बाहर नहीं करेंगे। डा. राव के अनुसार मानव प्रबंधन की पूरी व्यवस्था पर गोरक्षपीठाधीश्वर स्वयं नजर रखते हैं और निरंतर मार्गदर्शन देते रहते हैं।