कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के फिर से हो रहे पलायन को रोकने की चुनौती

 

घाटी से पलायन को रोकने की चुनौती

भारत सरकार कश्मीर के इस ताजा पलायन को कैसे रोक पाएगी? यह आतंकवाद और उसकी शैली भी नई है। आतंकवाद की जगह यह स्थानीय स्तर की ‘सुपारी’ की साजिश ज्यादा लगती है। इसका मतलब है कि हत्यारों को स्थानीय स्तर पर पनाह दी जा रही है।

 कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का फिर से पलायन हो रहा है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेछ 370 हटाने के बाद से शांति बहाली और जनजीवन को सामान्य बनाने के सारी कवायदें जारी हैं। इन सबके बीच हिंदुओं की चुन-चुनकर की जा रही हत्याओं ने मनोबल गिराने का काम किया है। थोड़े-बहुत जो भी कश्मीरी पंडित और अन्य कर्मचारी थे, उन्होंने भी पलायन शुरू कर दिया है। वैसे कश्मीरी पंडितों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने की प्रक्रिया जारी है।

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हालांकि सरकार ने उन्हें जिला मुख्यालयों पर नियुक्त करने और सरकारी आवास मुहैया कराने का वादा किया है, लेकिन उससे भी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? कर्मियों को दफ्तर से आवास के बीच की दूरी हर रोज तय करनी है। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार जाना ही होगा। बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा? कर्मचारियों को कभी भी निशाना बनाया जा सकता है। सहज सवाल है कि कश्मीरी पंडितों की घाटी में कभी घर वापसी हो सकेगी? प्रधानमंत्री के स्तर पर नौकरियों का पैकेज भी पुनर्वास नीति के तहत था। कुल छह हजार पद सृजित किए गए थे। उनमें से 3841 पदों पर युवा कश्मीर लौटे थे। उनमें कश्मीरी और गैर-कश्मीरी सभी थे। कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त किए जाने के बाद 520 प्रवासी लोग कश्मीर लौटे थे। विभिन्न पदों पर उनकी नियुक्ति की गई। परंतु अब वे वहां रहना नहीं चाहते हैं।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1989-1990 के बीच कश्मीर घाटी में पैदा हुए हालात के चलते बड़ी संख्या में कश्मीरी हिंदू परिवार वहां से निकल आए थे। उन दिनों चरमपंथी संगठन कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए धमकाते थे। बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया, जिससे लोगों में डर पैदा हो गया था। कश्मीर से विस्थापन के बाद ये परिवार जम्मू और देश के अन्य शहरों में जाकर बस गए थे। तीन दशक बीत जाने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारें कश्मीरी हिंदुओं की घर वापसी सुनिश्चित नहीं कर पाई हैं।

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इन सबके बीच बुनियादी सवाल यह है कि भारत सरकार कश्मीर के इस ताजा पलायन को कैसे रोक पाएगी? यह आतंकवाद और उसकी शैली भी नई है। आतंकवाद की जगह यह स्थानीय स्तर की ‘सुपारी’ की साजिश ज्यादा लगती है। इसका मतलब है कि हत्यारों को स्थानीय स्तर पर पनाह दी जा रही है। उसे खंगालना सेना और सुरक्षा बलों के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। पनाह के खेल को तोड़ना और नष्ट करना पड़ेगा। उसमें कोई हमदर्दी, कोई सियासत नहीं होनी चाहिए।

उम्मीद और विश्वास किया जाना चाहिए कि देर-सवेर घाटी में शांति की स्थापना के लक्ष्य पूरे हो सकेंगे। पुलिस-सुरक्षा बलों की मुस्तैदी व शासन-प्रशासन की सक्रियता यह उम्मीद जगाती है। साथ ही आतंकवाद के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए और हालिया हमलों में शामिल आतंकवादियों की पहचान करके उन्हें नेस्तनाबूद किया जाना चाहिए। साथ ही घाटी में सद्भावना का परिवेश भी बनाया जाना जरूरी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि घाटी में परिसीमन के बाद जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया आरंभ होगी तो स्थिति सामान्य बनाने में मदद मिल सकती है।