खाद्य प्रबंधन को एमएसपी के सहारे साधने की कोशिश, दाल और तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं का घटेगा आयात

 

एमएसपी के सहारे पुख्ता खाद्य प्रबंधन की रणनीति (फाइल फोटो)

MSP Analysis आठ जून को घोषित समर्थन मूल्य में इन फसलों में 300 रुपये से 523 रुपये प्रति ¨क्वटल तक की वृद्धि की गई है। कृषि विज्ञानियों की मानें तो दलहनी व तिलहनी फसलों की खेती से किसानों को दोहरा लाभ मिलेगा।

 नई दिल्ली। सरकार फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के सहारे पुख्ता खाद्य प्रबंधन की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। परंपरागत फसल चक्र से हटकर आयात निर्भरता वाली फसलों की खेती पर जोर दिया जा रहा है। चालू खरीफ सीजन की फसलों के लिए घोषित एमएसपी में दलहनी व तिलहनी फसलों को विशेष प्रोत्साहन दिया गया है। माना जा रहा है कि इससे दाल और तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं का आयात घटेगा।बता दें कि लगभग एक लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा तेल और दाल के आयात पर खर्च होती है। पिछले कई सीजन से समर्थन मूल्यों की घोषणा में दालों और खाद्य तेलों वाली फसलों को विशेष तवज्जो मिलने लगी है। आठ जून को घोषित समर्थन मूल्य में इन फसलों में 300 रुपये से 523 रुपये प्रति क्विंटल तक की वृद्धि की गई है। कृषि विज्ञानियों की मानें तो दलहनी व तिलहनी फसलों की खेती से किसानों को दोहरा लाभ मिलेगा। इन फसलों की लागत जहां बहुत सीमित होती है, वहीं उपज के बेहतर व लाभकारी मूल्य प्राप्त होते हैं। इन फसलों में फर्टिलाइजर व सिचाई की बहुत कम जरूरत होती है। इतना ही नहीं फसल विविधीकरण की सरकार की योजना के फलीभूत होने की संभावना बढ़ सकती है।

2.77 करोड़ टन दालों की पैदावार

बीते फसल वर्ष 2021-22 के दौरान देश में कुल 2.77 करोड़ टन दालों की पैदावार हुई है जो घरेलू जरूरतों के बराबर है। हालांकि कुछ फसलों में थोड़ी बहुत कमी है, जिसमें अरहर, उड़द और मूंग है। ये सभी फसलें खरीफ सीजन वाली हैं। सरकार ने इनके समर्थन मूल्यों में पर्याप्त वृद्धि की घोषणा की है। खुले बाजार में इनके मूल्य एमएसपी के मुकाबले अधिक बोले जा रहे हैं।

कुल 7.50 करोड़ टन खाद्यान्न की जरूरत

देश में राशन प्रणाली के लिए कुल 7.50 करोड़ टन खाद्यान्न की जरूरत है। जबकि सरकारी गोदामों में इससे कहीं अधिक अनाज का स्टाक है। इन सरप्लस अनाज की वजह से सरकार की खाद्य सब्सिडी में भारी वृद्धि होती रहती है। सरकारी स्टाक वाले गेहूं के निर्यात की भी अनुमति डब्लूटीओ से नहीं मिलती है। ऐसे में यह गेहूं जैसे तैसे घरेलू बाजार में लागत से कम मूल्य पर बेचना सरकार की मजबूरी हो जाती है। इससे खुले बाजार में कीमतें बहुत नीचे चली जाती हैं जो किसानों और खेती के लिए नुकसानदायक साबित होती है।